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जिन्दगी अनवरत चलती है

कविता

जिन्दगी अनवरत चलती है,
ये कब कहाँ किसी के लिए रूकती है।
वो दोस्त जिन्हें सुनाये थे किस्से,

हर बात के, प्यार के तकरार के।
कभी जीत के कभी हार के।
वो जो बाख़बर थे तुमारे हर जज़्बात से।
जो जानते थे बेहतर तुम्हे, तुमसे।

जो मानते थे तुम्हे बेहतर तुमसे।
वाकिफ थे तुमारे हर अँधेरे उजाले किस्सों से,
कई बार समेटा तुम्हे, तुम्हारे बिखरे हिस्सों से ।
जिनसे यूँ तो करने को कोई बात नहीं होती थी,

पर बातो बातों में कब दिन , कब रात होती थी।
लगता था कभी न बिछड़ेंगे,

ये किस्से यारी के दिल से न उखड़ेंगे।

अचानक ज़िन्दगी ने एक मोड़ लिया,

और ज़िन्दगी नए रास्ते चल पड़ी,
हाँ मगर वो किस्से रुक गए, जो थे अटूट हिस्से, छूट गए।
ज़िन्दगी अब भी अनवरत चल रही है,

हाँ बस अब उन दोस्तों से मुलाकात नहीं होती,

पहले जैसी अब बात नहीं होती।
उंगलिया रुक जाती है, नम्बर डायल करते करते,
सोच के की जिनसे बातो की कोई सीमा नहीं थी,

उनसे अब क्या बात करेंगे।
बेहतर है यादो की जुगाली कर ले।….

हाँ, मगर अब वक्त में, वो वक़्त ला दिया है,
बेमन से सही,
वो नंबर डायल कर लो,
उन भूले बिसरों से बात कर लो,
अजब दौर से गुजर रहे हैं सब
वो यार गुजर ना जाये,
उसे याद कर लो।

कोरोना काल मे, दोस्त मेरे,
एक बार, अपने यारों से बात कर लो।

युवा कवि नितिन राठौर, इंदौर, मध्य प्रदेश
पेशे से मेकैनिकल इंजीनयर
अभीरुचियाँ—कविता और ब्लॉग लिखने के साथ
मंच संचालन

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