
रंगभरी एकादशी पर काशी में सजेगा बाबा का शाही गौना, 350 साल पुरानी परंपराओं से जीवंत होगी आस्था की नगरी
वाराणसी में आमलकी एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी का पर्व इस बार भी पारंपरिक उल्लास और भव्यता के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना कराने जाते हैं और काशीवासी बराती बनकर इस दिव्य उत्सव में शामिल होते हैं। महाशिवरात्रि के समाप्त होते ही शहर में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं और पूरा वातावरण भक्ति व लोकरीति के रंग में रंग जाता है।
पीढ़ियों से निभ रही सेवाओं की परंपरा
उत्सव में हर परिवार अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है—कोई पान अर्पित करता है, कोई वस्त्र लाता है, तो कोई रंग-गुलाल या पगड़ी भेंट करता है। कुछ महिलाएं गौरा को हल्दी चढ़ाने की रस्म निभाती हैं, जबकि कई श्रद्धालु काजल और सिंदूर की भेंट तैयार करते हैं। यह सामूहिक सहभागिता ही रंगभरी एकादशी को अद्वितीय बनाती है।
पूर्व महंत आवास से शुरू होकर धाम तक पहुंचता उत्सव
लोकाचारों का शुभारंभ टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास से होता है और समापन श्रीकाशी विश्वनाथ धाम में होता है। बताया जाता है कि पूर्व महंत आवास में यह आयोजन 350 वर्षों से अधिक समय से निरंतर चला आ रहा है। महाशिवरात्रि के बाद यह स्थान गौरा सदनिका यानी माता गौरा का मायका बन जाता है, जहां गौना से तीन दिन पहले हल्दी की रस्म और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं।
शाही पगड़ी से राजसी श्रृंगार तक खास तैयारियां
जब बाबा दूल्हे के रूप में ससुराल के लिए प्रस्थान करते हैं, तब उनकी चल प्रतिमा के लिए लल्लापुरा का एक परिवार चार पीढ़ियों से शाही पगड़ी तैयार कर भेंट करता आ रहा है। इसी तरह विश्वनाथ गली का एक परिवार तीन सदियों से पान अर्पित करने की परंपरा निभा रहा है। पारंपरिक परिधान सिलने वाले कारीगरों की पीढ़ियां भी इस सेवा से जुड़ी रही हैं और अब नई पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
देवकिरीट और राजसी साज-सज्जा का विशेष महत्व
गौने के दिन बाबा के मस्तक पर सजने वाला देवकिरीट (मुकुट) भी पीढ़ियों से एक ही परिवार तैयार करता है। इस बार इसमें मराठी शैली की विशेष झलक देखने को मिलेगी। वहीं पिछले तीन दशकों से एक ही शृंगारकार बाबा की चल प्रतिमा को राजसी रूप प्रदान कर रहे हैं, जिससे यह पर्व श्रद्धा के साथ-साथ परंपरा और कला का भी जीवंत संगम बन जाता है।



