ब्लड डोनेशन पर विवाद: ट्रांसजेंडर, MSM और सेक्स वर्कर्स को क्यों रोका गया? सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने बताई वजह

नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स (FSW) को रक्तदान से बाहर रखने की नीति को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट किया है। सरकार ने हलफनामा दाखिल करते हुए कहा कि इन समुदायों को रक्तदान से बाहर रखने का फैसला किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बल्कि विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित है।
सरकार ने स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्टों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि इन विशिष्ट समूहों में एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों की दर सामान्य आबादी की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक पाई गई है। ऐसे में रक्तदान से जुड़े नियम बनाते समय सबसे बड़ी प्राथमिकता उस मरीज की सुरक्षा होती है, जिसे रक्त चढ़ाया जाना है।
सुरक्षित रक्त को बताया सबसे बड़ी प्राथमिकता
केंद्र सरकार ने अदालत में दलील दी कि किसी व्यक्ति की रक्तदान करने की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण उस मरीज की जान और सुरक्षा है, जिसे खून दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की अहम जिम्मेदारी है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, सुरक्षित रक्त प्राप्त करना एक मौलिक अधिकार है। इसलिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन से जुड़े नियम बनाते समय मेडिकल विशेषज्ञों और वैज्ञानिक तथ्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि यह पूरी तरह तकनीकी और चिकित्सा से जुड़ा विषय है।
सरकार ने पेश किए ‘हाई-रिस्क’ समूहों के आंकड़े
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि यह नीति सांख्यिकीय और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर बनाई गई है। वर्ष 2020-21 की स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रांसजेंडर, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स में एचआईवी संक्रमण की दर सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक पाई गई है।
अगस्त 2025 में आई विशेषज्ञ समिति की ताजा रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा नियमों में फिलहाल किसी बदलाव की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसमें ढील देने से राष्ट्रीय स्तर पर रक्त आपूर्ति की विश्वसनीयता और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने बताया भेदभावपूर्ण नियम
वहीं दूसरी ओर ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट थंगजाम सांता सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं ने 2017 की गाइडलाइंस के उन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिनमें इन समुदायों को स्थायी रूप से रक्तदान से रोका गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत मिले समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि संक्रमण का जोखिम किसी व्यक्ति की पहचान से नहीं बल्कि असुरक्षित व्यवहार से जुड़ा होता है।
उन्होंने अदालत में यह भी दलील दी कि जब हर यूनिट खून की एचआईवी और एनएटी जांच अनिवार्य रूप से की जाती है, तो केवल पहचान के आधार पर किसी पूरे समुदाय को रक्तदान से रोकना तार्किक और न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।



