बोधघाट परियोजना से बदल सकता है बस्तर का भविष्य, सिंचाई और बिजली से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

नई दिल्ली से सामने आई तस्वीर बस्तर के उस यथार्थ को दिखाती है, जहां प्राकृतिक संपदा के बावजूद आर्थिक मजबूती अब भी चुनौती बनी हुई है। जंगलों में महुआ की खुशबू के बीच आदिवासी परिवारों की आजीविका काफी हद तक वनोपज और मानसून आधारित खेती पर टिकी है।
सुबह होते ही महिलाएं और बच्चे महुआ बीनने निकल पड़ते हैं, जो कई परिवारों की नकदी आय का मुख्य साधन है। बारिश के मौसम में धान, कोदो और कोसरा की खेती होती है, लेकिन फसल कटते ही खेत और रोजगार दोनों ठहर जाते हैं। यही वजह है कि संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद बस्तर का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है।
माओवादी प्रभाव की जड़ में आर्थिक कमजोरी
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की यही कमजोरी लंबे समय तक इस क्षेत्र में माओवादी प्रभाव की प्रमुख वजह रही है। सीमित आय के साधन और अस्थिर रोजगार ने हालात को और जटिल बनाया है।
इंद्रावती पर बोधघाट परियोजना से बदल सकती है तस्वीर
ऐसे में इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट परियोजना को बस्तर के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। यदि यह योजना धरातल पर उतरती है, तो बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे जिलों की लगभग सात लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिल सकती है, जिससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय में बड़ा इजाफा संभव है।
60 साल से अधूरी, अब नए स्वरूप में प्रयास
इस परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1960 में की गई थी और 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इसकी आधारशिला रखी थी। केंद्र सरकार ने इसके लिए विश्व बैंक से ऋण भी लिया था, लेकिन वन एवं पर्यावरण संबंधी आपत्तियों और विस्थापन के विरोध के चलते 1986 में इसे रोक दिया गया।
अब राज्य सरकार इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, हालांकि 52 जनजातीय गांवों के पुनर्वास की चुनौती इसके रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है। राजनीतिक स्तर पर भी इस परियोजना को लेकर खुलकर पहल कम दिखाई दे रही है।
सिंचाई के साथ बिजली उत्पादन का भी लक्ष्य
प्रस्तावित योजना के तहत बोधघाट को बहुउद्देशीय डैम के रूप में विकसित किया जाएगा। इससे सिंचाई के साथ-साथ बिजली उत्पादन भी संभव होगा। अनुमान है कि परियोजना से करीब 125 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा।
पड़ोसी राज्यों से तुलना में पीछे बस्तर
यदि इस परियोजना को समय पर पूरा किया जाता, तो दक्षिण बस्तर की तस्वीर काफी हद तक बदल सकती थी। पड़ोसी राज्य तेलंगाना और ओडिशा में बेहतर जल प्रबंधन और सिंचाई योजनाओं के चलते कृषि उत्पादन और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि बस्तर अब भी मानसून पर निर्भर बना हुआ है।
परियोजना की प्रमुख बातें
बोधघाट परियोजना को इंद्रावती-महानदी नदी जोड़ो योजना के साथ विकसित करने की योजना है। यह दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र के पास इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित है। पूरी परियोजना की अनुमानित लागत करीब 49 हजार करोड़ रुपये है, जिसमें बोधघाट बांध पर लगभग 29 हजार करोड़ रुपये और नदी जोड़ो योजना पर करीब 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
इससे 3.78 लाख हेक्टेयर भूमि को सीधे सिंचाई सुविधा मिलेगी, जबकि नदी जोड़ो योजना से अतिरिक्त 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को लाभ मिलेगा। कुल मिलाकर करीब सात लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित हो सकेगी।



