हिमाचल प्रदेश

121 साल पहले आया था कांगड़ा का महाभूकंप, 20 हजार मौतों ने हिला दिया था हिमाचल—आज भी बरकरार है खतरा

4 अप्रैल 1905 का दिन हिमाचल प्रदेश के इतिहास में एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। इसी दिन कांगड़ा क्षेत्र में 7.8 से 7.9 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया था, जिसने पूरे पश्चिमी हिमालय को झकझोर दिया। इस आपदा में 20 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई थी, जबकि करीब एक लाख से ज्यादा इमारतें पूरी तरह तबाह हो गई थीं। कांगड़ा, धर्मशाला और मैक्लोडगंज जैसे शहरों की बड़ी संख्या में इमारतें मलबे में तब्दील हो गई थीं।

पश्चिमी हिमालय का सबसे घातक भूकंप
यह भूकंप पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र का अब तक का सबसे घातक भूकंप माना जाता है। उस समय 53 हजार से अधिक मवेशियों की भी मौत हुई थी। जलसेतु और पेयजल आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह ठप हो गई थीं। उस दौर में इस आपदा से उबरने की लागत करीब 29 लाख रुपये आंकी गई थी, जो उस समय के हिसाब से बेहद बड़ी रकम थी।

आज मनाया जा रहा आपदा जागरूकता दिवस
इस भयावह त्रासदी की स्मृति में हर साल 4 अप्रैल को राज्य में आपदा जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस दिन स्कूलों, संस्थानों और समुदाय स्तर पर भूकंप से बचाव को लेकर मॉक ड्रिल और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि भविष्य में नुकसान को कम किया जा सके।

आज भी सुरक्षित नहीं हिमाचल, बढ़ा खतरा
121 साल बाद भी हिमाचल प्रदेश भूकंप के खतरे से अछूता नहीं है। भारतीय मानक ब्यूरो के दिसंबर 2025 में जारी भूकंपीय जोन मानचित्र के अनुसार पूरे राज्य को सबसे संवेदनशील जोन-6 यानी सुपर-क्रिटिकल श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि प्रदेश का हर जिला बड़े भूकंप की जद में आ सकता है।

भविष्य के खतरे का डरावना अनुमान
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के एक अध्ययन के मुताबिक, यदि हिमाचल में आधी रात के समय 8.0 तीव्रता का भूकंप आता है तो करीब 1.60 लाख लोगों की मौत और लगभग 11 लाख लोगों के घायल होने की आशंका है। यह आंकड़े बताते हैं कि राज्य में आपदा प्रबंधन की तैयारियां कितनी जरूरी हैं।

हाल के वर्षों में भी हुआ भारी नुकसान
प्राकृतिक आपदाओं का असर हाल के वर्षों में भी देखने को मिला है। वर्ष 2023 में राज्य में 11 हजार से अधिक मकान क्षतिग्रस्त हुए, जबकि 2025 में करीब 7,500 मकानों को नुकसान पहुंचा। कई इलाकों में जमीन धंसने की घटनाएं भी सामने आईं। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर निर्माण, ढलानों पर अनियोजित निर्माण और जल निकासी की खराब व्यवस्था इसके प्रमुख कारण हैं।

पारंपरिक तकनीकों को छोड़ना बढ़ा रहा जोखिम
विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक धज्जी दीवार और काठ-कुहनी जैसी तकनीकों को छोड़कर बिना तकनीकी निगरानी के आधुनिक निर्माण जोखिम को बढ़ा रहे हैं। अब भूकंपरोधी निर्माण तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि भविष्य में बड़े नुकसान से बचा जा सके।

हालिया झटकों ने फिर दिलाई याद
हाल ही में उत्तर भारत के कई हिस्सों में महसूस किए गए हल्के भूकंप के झटकों ने लोगों को एक बार फिर 1905 की त्रासदी की याद दिला दी। हालांकि इस बार कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इसने साफ कर दिया कि पहाड़ी राज्यों में भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है।

सुरक्षित निर्माण और जागरूकता ही बचाव का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित और भूकंपरोधी निर्माण, बेहतर जल निकासी व्यवस्था, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण और नियमित जागरूकता अभियान ही भविष्य की बड़ी आपदाओं से बचाव का सबसे कारगर उपाय हो सकते हैं।

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