मध्य प्रदेशराज्य

मुरैना में भक्ति की अनोखी मिसाल, खड़ियाहार गांव की रेखा ने भगवान ठाकुर जी से रचाया विवाह

मुरैना : मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के खड़ियाहार गांव में भक्ति की अनोखी मिसाल देखने को मिली. 42 साल की रेखा तोमर (Rekha Tomar) ने भगवान ठाकुर जी को अपना दूल्हा मानकर वैदिक रीति से विवाह रचा लिया. पूरे गांव में भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारे गूंजे. इस आयोजन को ग्रामीणों ने आस्था और समर्पण का दुर्लभ उदाहरण बताया।

मुरैना जिले के एक छोटे से गांव खड़ियाहार में 42 वर्षीय रेखा तोमर ने भगवान श्री ठाकुर जी को अपना जीवनसाथी मानते हुए पूरे विधि-विधान और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह रचा लिया. यह घटना सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस आस्था की अभिव्यक्ति है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है. गांव में हुए इस आयोजन ने हर किसी को चौंकाया भी और भावुक भी किया.

इस अनोखे विवाह की चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है. ग्रामीणों के मुताबिक, यह आयोजन पूरी तरह पारंपरिक हिंदू रीति से किया गया, जिसमें विवाह की हर रस्म को विधिवत निभाया गया. रेखा तोमर लंबे समय से ठाकुर जी की भक्ति में लीन थीं और उन्होंने पहले ही यह संकल्प लिया था कि वह अपना जीवन प्रभु को समर्पित करेंगी. यही संकल्प इस विवाह का आधार बना. भक्ति के इस रूप ने एक बार फिर यह साबित किया कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और यह व्यक्ति को अलग पहचान देती है.

ग्राम खड़ियाहार के प्राचीन देवालय में यह विवाह संपन्न हुआ. मंदिर के पुजारी रामदुलारे बाबा ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी धार्मिक रस्में पूरी कराईं. लग्न पत्रिका का वाचन हुआ. पूजन और पैर पूजाई जैसी परंपराएं निभाई गईं. पूरा आयोजन एक पारंपरिक शादी की तरह ही आयोजित किया गया, जिसमें हर विधि का पालन किया गया.

इस विवाह का सबसे भावुक पल तब आया, जब रेखा तोमर के भाई सुरेंद्र ने उनका कन्यादान किया. परिवार के लिए यह क्षण आस्था और भावना का संगम था. ग्रामीणों ने भी इस दृश्य को श्रद्धा के साथ देखा. यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी एक अलग अनुभव लेकर आया.

विवाह के दौरान पूरे गांव में भक्ति का माहौल रहा. भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारों से वातावरण गूंज उठा. बड़ी संख्या में ग्रामीण इस आयोजन में शामिल हुए. लोगों ने इसे आस्था और समर्पण की अनोखी मिसाल बताया. गांव के कई प्रमुख लोग भी कार्यक्रम में मौजूद रहे और उन्होंने इसे दुर्लभ आयोजन माना.

रेखा तोमर, पिता लाखन सिंह, लंबे समय से धार्मिक प्रवृत्ति की रही हैं. ग्रामीणों के अनुसार, वह अधिकतर समय पूजा-पाठ और भजन में व्यतीत करती थीं. उनका यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों की भक्ति और साधना का परिणाम था. उन्होंने सामाजिक जीवन से अलग हटकर आध्यात्मिक जीवन को प्राथमिकता दी.

धार्मिक मान्यताओं में ईश्वर को जीवनसाथी मानने की परंपरा नई नहीं है. इतिहास और भक्ति परंपरा में कई उदाहरण मिलते हैं, जहां भक्त ने ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लिया. ऐसे आयोजन समाज में आस्था और विश्वास को मजबूत करते हैं. हालांकि, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय होता है और हर व्यक्ति इसे अपने तरीके से समझता है।

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