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राफेल डील में नया मोड़! रूस के बड़े ऑफर से बदले समीकरण, फ्रांस पर बढ़ा दबाव

नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना के घटते लड़ाकू स्क्वाड्रनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बातचीत जारी है। करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की इस संभावित डील पर उच्च स्तर पर मंथन चल रहा है। हाल ही में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह भी फ्रांस दौरे पर रहे, लेकिन सौदे से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा अब भी अनसुलझा बना हुआ है।

भारत की मांग है कि राफेल विमान में स्वदेशी हथियार प्रणालियों, खासकर ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों को एकीकृत करने के लिए आवश्यक तकनीकी इंटरफेस से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाए। भारत का कहना है कि यदि सोर्स कोड साझा करना संभव नहीं है तो कम से कम इंटरफेस डॉक्यूमेंट दिया जाए। वहीं, फ्रांस इस मामले में सतर्क रुख अपनाए हुए है और ऐसी तकनीकी जानकारी साझा करने को लेकर फिलहाल तैयार नहीं दिख रहा है।

रूस ने पेश किया बड़ा विकल्प

राफेल डील को लेकर जारी गतिरोध के बीच रूस की ओर से भारत को एक अहम प्रस्ताव मिला है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत में कहा कि रूस भारत को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान एसयू-57 से लेकर एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम तक हर क्षेत्र में सहयोग देने के लिए तैयार है।

पुतिन के इस बयान को रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि भारत एसयू-57 की खरीद के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। ऐसे में भविष्य में भारत कितनी संख्या में राफेल या अन्य लड़ाकू विमान खरीदता है, यह मौजूदा बातचीत के नतीजों पर भी निर्भर करेगा।

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर नजर

एसयू-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है। वर्तमान में अमेरिका, चीन और रूस ही ऐसे देश हैं जिनके पास इस श्रेणी के लड़ाकू विमान परिचालन में हैं। हालांकि, एसयू-57 को लेकर समय-समय पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आती रही है, लेकिन रूस की ओर से तकनीकी सहयोग, स्थानीय उत्पादन और भारतीय जरूरतों के अनुरूप संशोधन जैसे प्रस्तावों ने इसकी अहमियत बढ़ा दी है।

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत राफेल के साथ-साथ एसयू-57 के कुछ स्क्वाड्रनों को भी शामिल करने की रणनीति पर विचार कर सकता है। इससे भारतीय वायुसेना की पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत पूरी हो सकती है। इसके बाद स्वदेशी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान कार्यक्रम के परिपक्व होने तक क्षमता संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

फ्रांस के लिए भी माना जा रहा संकेत

विशेषज्ञों के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति का यह सार्वजनिक प्रस्ताव केवल भारत के लिए सहयोग का संदेश नहीं है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार को भी संकेत देता है कि भारत के पास कई विकल्प मौजूद हैं। यदि तकनीकी शर्तों पर सहमति नहीं बनती है तो भारत अन्य रक्षा साझेदारों की ओर भी रुख कर सकता है।

भारत और रूस के रक्षा संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े में सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों की बड़ी संख्या मौजूद है। 250 से अधिक ऐसे विमान सेवा में हैं और इन्हें वायुसेना की प्रमुख ताकत माना जाता है।

रूस ने सुखोई-30 एमकेआई के मौजूदा उत्पादन ढांचे का उपयोग करते हुए एसयू-57 के निर्माण और असेंबली का भी प्रस्ताव दिया है। इससे लागत कम होने के साथ-साथ भारतीय हथियार प्रणालियों के एकीकरण की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है। ऐसे में रूस का यह प्रस्ताव भारत की रक्षा रणनीति और भविष्य की लड़ाकू विमान जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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