मध्य प्रदेशराज्य

पुस्तक चर्चा : अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

  • डॉ.लोकेन्द्र सिंह

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया, जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पुस्तक की भूमिका में उचित ही रेखांकित किया है कि यह केवल भाषणों का संकलन नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की जीवन-डायरी है जो शब्द को साधना और व्याख्यान को साध्य मानता है। डॉ. रमन सिंह की प्रस्तावना के शीर्षक से भी पुस्तक की विषय-वस्तु का सार ध्यान में आ जाता है- “भारतबोध की अभिव्यक्ति करते व्याख्यान”। प्रो. द्विवेदी की भाषा इतनी सहज-सरल और सरस है कि लिखा हुआ भी हमें सुनाई देता है, जो सहज ही पाठकों के अंतर्मन तक अपनी छाप छोड़ने का सामर्थ्य रखता है। लेखक की चिंता के केंद्र में निरंतर ‘भारतबोध’ और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का कल्याण झलकता है। इसके अलावा, प्रो. द्विवेदी ने प्रिंट और डिजिटल मीडिया के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि तकनीकी बदलावों या सोशल मीडिया के आने मात्र से प्रिंट मीडिया का भविष्य खतरे में नहीं है। अपनी बात को प्रमाणित करते हुए उन्होंने जापान का उदाहरण देते हुए बताया है कि तकनीक में आगे होने के बावजूद वहां अखबार छपते हैं और पढ़े जाते हैं। प्रो. द्विवेदी ‘फेक न्यूज’ और ‘इन्फोडेमिक’ (सूचनाओं के महाविस्फोट) के इस दौर में ‘मीडिया साक्षरता’ को न केवल छात्रों के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी अत्यंत अनिवार्य मानते हैं ताकि समाज में फैल रहे दुष्प्रभावों को रोका जा सके। उनका मानना है कि मीडिया का कार्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों को बौद्धिक रूप से उन्नत करना भी है।

इस डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं को लेकर भी उनके मन में चिंता दिखाई देती है। एक संचार विशेषज्ञ के तौर पर वे भारतीय भाषाओं और बोलियों के प्रबल पक्षधर के रूप में सामने आते हैं। वे अनुवाद को भारतीय भाषाओं को विश्व पटल पर स्थापित करने का एक मजबूत और अनिवार्य सेतु मानते हैं। वे समझाते हैं कि यदि मराठी का कोई लेखक पूरे भारत में प्रतिष्ठा हासिल करता है, तो यह बड़ी चुनौती और उपलब्धि है, जो अनुवाद के बिना संभव नहीं। एक अध्याय- ‘डिजिटल समय में भारतीय भाषाएं’ – में प्रो. द्विवेदी आंकड़ों के साथ बताते हैं कि इंटरनेट पर डिजिटल दुनिया में अब हिंदी सबसे बड़ी भाषा बनकर उभर रही है।

लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की भाषण कला में नयापन है। उनके अंदाजेबयां श्रोताओं के अनुसार होता है। यदि सामने युवा हैं, तब वे उनकी ही भाषा में बात करते हैं। मुहावरों, उपमाओं का बखूबी प्रयोग करने के साथ-साथ कई नये ‘डायलॉग’ वे स्वयं भी गढ़ते हैं। उनके पास किस्सागोई की अनूठी शैली है। उनके व्याख्यानों का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन मीडिया शिक्षक होने के नाते प्रो. द्विवेदी की भाषा शैली अत्यंत रोचक, संवादात्मक और किस्सागोई से भरपूर है। अपने व्याख्यानों में वे गंभीर और भारी-भरकम बातों को भी छोटी-छोटी प्रेरक कहानियों के माध्यम से सीधे श्रोताओं के मर्म तक पहुँचा देते हैं। प्रो. द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान, नईदिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं। वे वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।

‘संजय उवाच’ केवल जनसंचार और मीडिया के विद्यार्थियों या पत्रकारों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी जागरूक नागरिकों के लिए एक अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय कृति है, जो मीडिया और समसामयिक विषयों पर चलने वाले विमर्श में रुचि रखते हैं। पुस्तक के प्रकाशन की गुणवत्ता बेहतरीन है। नईदिल्ली के शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे प्रकाशित किया है। यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है।

पुस्तक : संजय उवाच
लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी
मूल्य: 495.00 रुपये
पृष्ठ : 370
प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली

(समीक्षक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। )

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