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नक्सलगढ़ से हेल्थ मॉडल तक: 23 साल की तपस्या ने बदल दी अंतागढ़ की पहचान, डॉक्टर रामटेके की कहानी बनी मिसाल

कांकेर: कभी नक्सली गतिविधियों और मलेरिया के प्रकोप के लिए चर्चित अंतागढ़ आज स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नई पहचान बना चुका है। घने जंगलों और सीमित संसाधनों वाले इस इलाके में जो बदलाव दिखाई दे रहा है, उसके पीछे एक डॉक्टर की दो दशक से अधिक लंबी सेवा, समर्पण और दृढ़ संकल्प की कहानी छिपी है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अंतागढ़ में पदस्थ डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके ने 23 वर्षों की निरंतर मेहनत से एक ऐसे मॉडल की नींव रखी, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रदेश में हो रही है।

जब अंतागढ़ में पोस्टिंग को माना जाता था सबसे कठिन

वर्ष 2003 में जब डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके की नियुक्ति अंतागढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई, तब यह इलाका डॉक्टरों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में गिना जाता था। नक्सली गतिविधियों का प्रभाव, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव यहां की प्रमुख समस्याएं थीं। कई गांवों तक पहुंचने के लिए घंटों पैदल सफर करना पड़ता था और पूरे क्षेत्र में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की लगभग कोई व्यवस्था नहीं थी।

अस्पताल नहीं, मिशन बन गया जीवन का उद्देश्य

कठिन परिस्थितियों के बावजूद डॉक्टर रामटेके ने इस नियुक्ति को सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि मिशन के रूप में स्वीकार किया। शुरुआती दिनों में उन्होंने अस्पताल परिसर को ही अपना ठिकाना बना लिया और दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटे रहे। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति लोगों का कम होता भरोसा भी है।

गांवों तक पहुंचे, लोगों की समस्याएं समझीं

डॉक्टर रामटेके ने इलाज को अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा। वे लगातार गांवों में पहुंचे, आदिवासी समुदायों के बीच समय बिताया और उनकी जीवनशैली तथा समस्याओं को करीब से समझा। इस दौरान उन्हें पता चला कि अधिकांश लोग बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते और देर से इलाज कराने पहुंचते हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।

मलेरिया के खिलाफ छेड़ी निर्णायक लड़ाई

उस समय अंतागढ़ में मलेरिया सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुका था। वर्ष 2003 में क्षेत्र का वार्षिक परजीवी सूचकांक (एपीआई) 51.11 था, जो वर्ष 2006 तक बढ़कर 70.65 तक पहुंच गया। केवल वर्ष 2006 में 4,942 मलेरिया मरीज दर्ज किए गए थे। इनमें से 95 से 98 प्रतिशत मामले प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया के थे, जिसे सबसे घातक श्रेणी का मलेरिया माना जाता है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टर रामटेके ने मलेरिया नियंत्रण को अपनी प्राथमिकता बनाया और इसके खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया।

जनजागरूकता ने बदली तस्वीर

मलेरिया उन्मूलन के लिए स्वास्थ्य विभाग, मितानिनों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदाय को एक मंच पर लाया गया। गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाए गए, ग्राम सभाओं के माध्यम से लोगों को जानकारी दी गई और घर-घर पहुंचकर बचाव के उपाय समझाए गए।

वर्ष 2010 और 2015 में पूरे क्षेत्र में लॉन्ग लास्टिंग इंसेक्टिसाइडल नेट का वितरण किया गया। लोगों को मच्छरदानी के नियमित उपयोग के लिए प्रेरित किया गया, जिससे धीरे-धीरे संक्रमण की श्रृंखला कमजोर पड़ने लगी।

4942 से घटकर 127 पर पहुंची मरीजों की संख्या

लगातार प्रयासों का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। जहां वर्ष 2006 में मलेरिया के 4,942 मरीज सामने आए थे, वहीं वर्ष 2025 तक यह संख्या घटकर केवल 127 रह गई। इसी अवधि में एपीआई 70.65 से घटकर 1.39 पर पहुंच गया। मलेरिया जनित मौतों और गंभीर मामलों में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

अब अस्पताल बना पूरे प्रदेश के लिए उदाहरण

मलेरिया नियंत्रण में सफलता के बाद डॉक्टर रामटेके ने अस्पताल के समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कायाकल्प योजना के तहत अस्पताल को मॉडल स्वास्थ्य संस्थान बनाने का अभियान शुरू किया।

साफ-सफाई, संक्रमण नियंत्रण, जैविक अपशिष्ट प्रबंधन, मरीजों की सुविधाएं और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में लगातार सुधार किए गए। कभी दो कमरों के खपरेल भवन से संचालित होने वाला स्वास्थ्य केंद्र आज 30 बिस्तरों वाले व्यवस्थित अस्पताल के रूप में विकसित हो चुका है।

350 से ज्यादा मानकों पर खरा उतरा अस्पताल

कायाकल्प योजना के तहत अस्पतालों का मूल्यांकन 350 से अधिक बिंदुओं पर किया जाता है। अंतागढ़ अस्पताल ने इन मानकों पर लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। पिछले पांच वर्षों से यह अस्पताल बस्तर संभाग में प्रथम स्थान हासिल कर रहा है। वर्ष 2025 में इसे छत्तीसगढ़ के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ।

एक डॉक्टर, हजारों लोगों की बदली जिंदगी

नक्सल प्रभावित और संसाधन-विहीन क्षेत्र में 23 वर्षों तक लगातार सेवाएं देना अपने आप में असाधारण उपलब्धि मानी जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, डॉक्टर रामटेके केवल चिकित्सक नहीं बल्कि परिवार के सदस्य की तरह बन चुके हैं। कई पीढ़ियां उनके इलाज और मार्गदर्शन से लाभान्वित हुई हैं और अनेक परिवार उन्हें अपने जीवन का संरक्षक मानते हैं।

अब पूरे प्रदेश में लागू हो सकता है मॉडल

डॉक्टर रामटेके द्वारा विकसित मलेरिया नियंत्रण और अस्पताल प्रबंधन मॉडल को अब राज्य स्तर पर अपनाने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि यदि अंतागढ़ जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में यह मॉडल सफल हो सकता है, तो प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है।

डर की पहचान से भरोसे की मिसाल तक

अंतागढ़ की यह यात्रा केवल एक अस्पताल की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जिसे स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से समाज में दोबारा स्थापित किया गया। कभी नक्सली घटनाओं और मलेरिया के लिए पहचाने जाने वाला यह इलाका आज स्वास्थ्य प्रबंधन और जनसेवा के मॉडल के रूप में नई पहचान बना चुका है। इस बदलाव के केंद्र में डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके का समर्पण, धैर्य और सेवा भावना है, जिसने यह साबित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने सबसे कठिन परिस्थितियां भी बदली जा सकती हैं।

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