NCSC की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- आयोग दे सकता है सिफारिश, अदालत की तरह आदेश नहीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) की संवैधानिक शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आयोग कोई न्यायिक संस्था नहीं है। अदालत ने कहा कि एनसीएससी के पास अदालत या ट्रिब्यूनल की तरह बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। आयोग शिकायतों की जांच कर सकता है, तथ्यों का आकलन कर सकता है और सरकार को आवश्यक सिफारिशें भेज सकता है, लेकिन अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी फैसला नहीं सुना सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान के तहत गठित राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का उद्देश्य अनुसूचित जातियों के अधिकारों की रक्षा करना और उनके हितों की निगरानी करना है। हालांकि, इसकी भूमिका सलाहकार और सिफारिशी है, न्यायिक नहीं।
पीठ ने कहा कि आयोग अपनी रिपोर्ट और सुझाव केंद्र तथा राज्य सरकारों को भेज सकता है, लेकिन किसी सेवा विवाद या अन्य मामले में ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकता जिसे कानूनी रूप से लागू करने योग्य माना जाए।
संविधान के अनुच्छेद 338A और 338B की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 338A और 338B के तहत गठित संवैधानिक आयोगों का गठन सामाजिक न्याय और कल्याण के उद्देश्य से किया गया है। इन आयोगों की जिम्मेदारी शिकायतों की जांच करना, रिपोर्ट तैयार करना और सरकार को आवश्यक सुधारात्मक कदमों की सिफारिश करना है। संविधान ने इन्हें अदालत जैसी न्यायिक शक्तियां प्रदान नहीं की हैं।
जांच का अधिकार है, लेकिन अंतिम फैसला नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग अनुसूचित जातियों के अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जांच कर सकता है। जांच के दौरान वह दस्तावेज तलब कर सकता है, गवाहों के बयान दर्ज कर सकता है और साक्ष्य स्वीकार कर सकता है।
हालांकि, इन साक्ष्यों के आधार पर आयोग स्वयं कोई अंतिम या बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। उसका दायित्व तथ्यों का परीक्षण कर संबंधित राज्य या केंद्र सरकार को उचित कार्रवाई के लिए सिफारिश करना है।
आयोग की दलील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से दलील दी गई थी कि संविधान में प्रयुक्त “सुरक्षा” शब्द का अर्थ कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना भी है। इसलिए आयोग को व्यापक अधिकार मिलने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि संविधान और संबंधित कानूनों की भाषा पूरी तरह स्पष्ट है। इनमें आयोग को न्यायिक अधिकार नहीं दिए गए हैं। इसलिए वह अदालत या ट्रिब्यूनल की तरह दो पक्षों के अधिकारों पर अंतिम निर्णय नहीं दे सकता।
अन्य आयोगों की भूमिका पर भी पड़ सकता है असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर अन्य संवैधानिक और वैधानिक आयोगों की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है। महिलाओं, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और अन्य सामाजिक समूहों से जुड़े आयोगों की शक्तियों की व्याख्या में भी इस निर्णय को महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।
इस फैसले से यह सिद्धांत और स्पष्ट हो गया है कि ऐसे आयोगों की भूमिका मुख्य रूप से शिकायतों की जांच, निगरानी और सरकार को सिफारिशें देने तक सीमित है, जबकि अंतिम और बाध्यकारी निर्णय देने का अधिकार केवल सक्षम न्यायिक संस्थाओं के पास है।



