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AI पर ब्रेक लगा तो चीन निकल जाएगा आगे? ट्रंप की दलील में कितना दम, सुरक्षा बनाम टेक्नोलॉजी की रेस में फंसी दुनिया

वॉशिंगटन: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की रफ्तार को लेकर दुनिया में बहस तेज हो गई है। एक तरफ सिलिकन वैली के कुछ बड़े AI विशेषज्ञ और कंपनियां ज्यादा ताकतवर मॉडल विकसित करने की गति को नियंत्रित करने की बात कर रहे हैं। उनका तर्क है कि AI की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि सुरक्षा और निगरानी के इंतजाम उसी रफ्तार से आगे नहीं बढ़ रहे। दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अगर अमेरिका AI विकास में रुक गया तो चीन तकनीकी दौड़ में आगे निकल सकता है।

ऐसे में बहस सिर्फ AI की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। इसके साथ बड़ी टेक कंपनियों के प्रभाव, एकाधिकार, अमेरिका-चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा और AI के लिए वैश्विक नियमों का सवाल भी जुड़ गया है।

दारियो आमोदेई का ‘पेसिंग द फ्रंटियर’ प्रस्ताव क्या है?

AI कंपनी एंथ्रॉपिक के सीईओ दारियो आमोदेई ने AI विकास की रफ्तार को लेकर ‘पेसिंग द फ्रंटियर’ का प्रस्ताव रखा है। इसका मतलब AI विकास को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि बेहद शक्तिशाली AI मॉडल विकसित करने की गति को कुछ हद तक नियंत्रित करना है।

इसके पीछे दो प्रमुख चिंताएं बताई गई हैं। पहली है रिकर्सिव सेल्फ-इम्प्रूवमेंट। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है जहां AI खुद को बेहतर बनाने में मदद कर सके। इसके शुरुआती संकेत दिखाई देने की बात कही जा रही है, जहां AI अगली पीढ़ी के AI सिस्टम तैयार करने में शोधकर्ताओं की मदद कर रहा है।

दूसरी चिंता AI एजेंट्स के नियंत्रण से बाहर होने की है। हाल ही में OpenAI के ‘हगिंग फेस’ इंसिडेंट में टेस्टिंग के दौरान AI एजेंट्स के दिए गए काम से अलग गतिविधियां करने, सुरक्षा उपायों से बचने और बाहरी सिस्टम पर हमला करने की बात सामने आई। OpenAI ने भी इसे चेतावनी के तौर पर देखा।

आमोदेई का तर्क है कि जब तक AI को सुरक्षित रखने और उसकी निगरानी के बेहतर तरीके विकसित नहीं हो जाते, तब तक नए और ज्यादा शक्तिशाली मॉडल लाने की गति को नियंत्रित करना चाहिए।

सैम ऑल्टमन और सत्या नडेला की क्या राय है?

आमोदेई के प्रस्ताव को OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमन का भी समर्थन मिला। सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं के बाद OpenAI ने अपनी स्केलिंग की रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी की। कंपनी ने अपना सबसे बड़ा प्रस्तावित रीइन्फोर्समेंट-लर्निंग रन भी रोक दिया और रिसर्च के माहौल पर नियंत्रण कड़ा किया।

Microsoft के प्रमुख सत्या नडेला ने भी सोच-समझकर AI विकास की गति तय करने और कंपनियों के भीतर स्वतंत्र जांचकर्ताओं की मौजूदगी का समर्थन किया। हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि AI की निगरानी का अधिकार कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं होना चाहिए।

AI सुरक्षा को लेकर कितनी बड़ी चिंता?

मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी और मिला-क्यूबेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंस्टीट्यूट के असिस्टेंट प्रोफेसर डेविड क्रूगर AI के संभावित खतरों को लेकर आमोदेई से भी ज्यादा सख्त रुख रखते हैं। उनका कहना है कि फ्रंटियर AI के विकास पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल रोक लगाने की जरूरत हो सकती है।

उनके मुताबिक, केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा और शक्तिशाली AI के विकास की निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता होगी।

वहीं, इस बहस में एक अहम सवाल यह भी है कि AI सुरक्षा के नाम पर नियम बनाने की ताकत कहीं उन्हीं बड़ी कंपनियों के हाथ में न चली जाए, जो सबसे उन्नत AI सिस्टम विकसित कर रही हैं।

जकरबर्ग और मुस्तफा सुलेमान क्यों नहीं चाहते रफ्तार पर रोक?

मेटा के प्रमुख मार्क जकरबर्ग ने पूरी इंडस्ट्री की AI विकास गति धीमी करने के सुझाव का विरोध किया है। उनका तर्क है कि कंपनियों के पास अपने AI सिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए पहले से मजबूत कारोबारी कारण मौजूद हैं।

जकरबर्ग ने मेटा के ‘Muse AI’ एजेंट का उदाहरण दिया, जिसकी लॉन्चिंग कंपनी ने सुरक्षा कारणों से खुद टाल दी थी। उनका कहना है कि जब मेटा ने अपने सिस्टम को रोका तो उसने दूसरी कंपनियों से भी ऐसा करने की मांग नहीं की।

Microsoft AI के प्रमुख मुस्तफा सुलेमान ने भी बहस को सिर्फ ‘रफ्तार कम या ज्यादा करने’ के सवाल तक सीमित रखने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि वह एक कंपनी या संस्था के फैसले को बाकी सभी पर थोपने को लेकर सावधान रहेंगे।

ट्रंप ने क्यों कहा- AI में रुके तो चीन आगे निकल जाएगा?

AI सुरक्षा की बहस में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख अलग नजर आता है। एक टेक सम्मेलन के दौरान Nvidia के सीईओ जेन्सन हुआंग मंच पर थे, तभी ट्रंप का फोन आया। हुआंग ने फोन स्पीकर पर डाल दिया।

ट्रंप ने AI से जुड़े उन दावों को खारिज किया जिनमें रोबोट के दुनिया पर कब्जा करने जैसी आशंकाएं जताई जाती हैं। उन्होंने चिंता जताई कि अगर अमेरिका AI विकास में पीछे हटा तो चीन तकनीकी दौड़ में आगे निकल सकता है। उनका कहना था कि AI में जो आगे रहेगा, वही इस प्रतिस्पर्धा में विजेता होगा।

हालांकि जेन्सन हुआंग का रुख पूरी तरह ट्रंप जैसा नहीं है। उनका कहना है कि अगर किसी कंपनी को लगता है कि उसका AI सिस्टम नियंत्रण से बाहर जा रहा है तो उसे अपनी विकास गति खुद धीमी करनी चाहिए। लेकिन दुनिया खत्म होने जैसी आशंकाओं को वह पर्याप्त वैज्ञानिक आधार वाला नहीं मानते।

क्या AI सुरक्षा की आड़ में एकाधिकार का खतरा है?

AI सुरक्षा को लेकर बहस का एक दूसरा पहलू बड़ी कंपनियों की भूमिका है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सबसे शक्तिशाली AI सिस्टम बनाने वाली कंपनियों को ही यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि दूसरी कंपनियां और शोधकर्ता AI कैसे विकसित करें।

पूर्व ट्विटर प्रमुख जैक डोर्सी ने खतरनाक AI क्षमताओं की कड़ी जांच और स्वतंत्र समीक्षा का समर्थन किया है। लेकिन वह ऐसी पाबंदियों के विरोध में हैं जिनसे बड़ी AI लैब्स को सबसे उन्नत AI के विकास पर नियंत्रण मिल जाए। उन्होंने ओपन-सोर्स AI और बाहरी शोधकर्ताओं के जरिए स्वतंत्र जांच की वकालत की है।

इसी बहस में एंथ्रॉपिक और दारियो आमोदेई की आलोचना भी हुई है। ट्रंप के पूर्व AI और क्रिप्टो सलाहकार डेविड सैक्स ने आरोप लगाया है कि एंथ्रॉपिक अपने शोध में AI के संभावित खतरों को ज्यादा प्रमुखता से पेश करती है और इससे नियम बनाने की प्रक्रिया उसके हित में प्रभावित हो सकती है।

यह आलोचना नई नहीं है। 2019 में आमोदेई OpenAI में रिसर्च डायरेक्टर थे। उस समय OpenAI ने GPT-2 के सबसे बड़े मॉडल को इसके संभावित दुरुपयोग की चिंता के कारण तुरंत जारी नहीं किया था। करीब नौ महीने बाद पूरा मॉडल रिलीज किया गया। OpenAI ने बाद में कहा था कि उसे बड़े पैमाने पर दुरुपयोग का कोई बड़ा सबूत नहीं मिला। AI सुरक्षा के आलोचक आज भी इस मामले का हवाला देते हैं।

आज का AI 2019 के GPT-2 से कितना अलग है?

आज के AI मॉडल 2019 के GPT-2 के मुकाबले काफी अधिक क्षमताओं वाले हैं। ये कोड लिख और चला सकते हैं, बाहरी टूल इस्तेमाल कर सकते हैं, दूसरे AI एजेंट्स के साथ काम कर सकते हैं और AI रिसर्च में भी मदद कर सकते हैं।

Palo Alto Networks के सीईओ निकेश अरोड़ा ने इसी बदलाव को साइबर सुरक्षा के संदर्भ में समझाया है। उनका कहना है कि पारंपरिक साइबर सुरक्षा व्यवस्था उस दौर के लिए तैयार की गई थी, जब हैकर इंसानों की गति से काम करते थे। अब AI लगातार और स्वचालित तरीके से सिस्टम की कमजोरियां खोज सकता है।

यही अंतर AI सुरक्षा बहस को पहले के मुकाबले अधिक जटिल बनाता है। AI की क्षमताएं बढ़ने के साथ संभावित जोखिमों की प्रकृति भी बदल रही है।

जेफ्री हिंटन ने सुझाया ‘मदरली इंस्टिंक्ट’ वाला समाधान

AI सुरक्षा पर अलग-अलग विशेषज्ञ अलग-अलग समाधान सुझा रहे हैं। पैलेंटिर के सीटीओ श्याम संकर ने AI सुरक्षा आंदोलन की आलोचना करते हुए कहा है कि भविष्य के काल्पनिक खतरों के नाम पर विशेषज्ञों का एक छोटा समूह AI पर ज्यादा नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

इसके उलट, नोबेल पुरस्कार विजेता और AI के प्रमुख वैज्ञानिकों में शामिल जेफ्री हिंटन ने AI मॉडल्स में ‘मदरली इंस्टिंक्ट’ यानी मातृत्व जैसी प्रवृत्ति विकसित करने का विचार रखा है।

अगस्त में हुई Ai4 कॉन्फ्रेंस में हिंटन ने तर्क दिया कि इंसानों से ज्यादा बुद्धिमान AI को नियंत्रित करने का एक संभावित मॉडल मां और बच्चे का रिश्ता हो सकता है। उनके मुताबिक, AI को इस तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि भविष्य में वह इंसानों से ज्यादा शक्तिशाली और बुद्धिमान होने के बावजूद उनकी परवाह करे।

अमेरिकी संसद तक पहुंची AI सुरक्षा की बहस

AI सुरक्षा का मुद्दा अब अमेरिकी संसद तक पहुंच चुका है। सीनेटर ऐसे प्रस्तावों पर विचार कर रहे हैं जिनमें AI डेवलपर्स को अपने सुरक्षा उपाय साबित करने और सरकारी परीक्षण से गुजरने की जरूरत पड़ सकती है। गंभीर मामलों में जोखिम वाले AI मॉडल की रिलीज रोकने का प्रावधान भी प्रस्तावित किया जा सकता है।

OpenAI ने भी माना है कि सिर्फ कंपनियों के स्वैच्छिक वादों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कंपनी ने राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र जांच, साइबर सुरक्षा उपायों और AI से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए अनिवार्य नियमों की मांग की है।

चीन का डर और अमेरिका की तकनीकी बढ़त

AI पर ब्रेक लगाने की बहस में चीन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। दारियो आमोदेई भी यह नहीं कहते कि चीन जो करे, अमेरिका अपनी गति पूरी तरह रोक दे। उनके प्रस्ताव में लोकतांत्रिक देशों के लिए चीन के मुकाबले बड़ी तकनीकी बढ़त बनाए रखने की बात कही गई है।

इसके लिए एडवांस्ड चिप्स के निर्यात पर नियंत्रण और AI मॉडल्स के वेट्स चोरी से बचाव जैसे कदमों का समर्थन किया गया है। AI में वेट्स से आशय मॉडल की सीखी हुई गणितीय सेटिंग्स से है। इन्हें चुराकर कोई दूसरा पक्ष बिना उतनी मेहनत के उसी मॉडल की नकल तैयार कर सकता है।

आमोदेई का तर्क है कि अगर अमेरिका अपनी तकनीकी बढ़त की तुलना में AI विकास को बहुत ज्यादा धीमा कर देता है तो चीन आगे निकल सकता है। इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में मजबूत सत्यापन व्यवस्था जरूरी होगी, ताकि कोई देश छिपकर शक्तिशाली AI विकसित न कर सके।

अमेरिका और चीन ने शुरू किया AI संवाद

इसी बीच अमेरिका और चीन के बीच AI को लेकर द्विपक्षीय संवाद शुरू करने पर सहमति बनी है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की बातचीत के बाद दोनों देशों ने AI से जुड़े साझा लक्ष्यों, संभावित खतरों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की जानकारी साझा करने के लिए एक तंत्र विकसित करने पर चर्चा शुरू की।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश फ्रंटियर AI से जुड़े कुछ जोखिमों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्हें नियंत्रित करने के तरीकों में बड़ा अंतर है।

चीन टेक विश्लेषक और ‘हेलो चाइना टेक’ के संस्थापक पो झाओ के मुताबिक, अमेरिकी और चीनी व्यवस्था में एक बड़ा अंतर यह है कि AI लैब की निगरानी किस चरण में और किस तरह की जाती है।

आमोदेई के प्रस्ताव में मॉडल की ट्रेनिंग के दौरान ही स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता को AI लैब के भीतर कर्मचारी स्तर की पहुंच देने की बात है। इसके विपरीत चीन का मौजूदा कानूनी ढांचा मुख्य रूप से AI सेवा के सार्वजनिक लॉन्च पर केंद्रित है। वहां नियामकों को डेटा और एल्गोरिदम की जांच का अधिकार है, लेकिन विकास के दौरान AI लैब के भीतर लगातार निगरानी की अनिवार्यता नहीं है।

चीन ने ‘TC260 AI Safety Framework 3.0’ गाइडलाइंस भी जारी की हैं। इसमें सेल्फ-इम्प्रूवमेंट और नियंत्रण से बाहर होने वाले AI एजेंट्स को जोखिम माना गया है। हालांकि ये बाध्यकारी कानून नहीं बल्कि दिशा-निर्देश हैं।

तकनीकी वर्चस्व के साथ जुड़ी AI सुरक्षा

पो झाओ के मुताबिक, अमेरिका और चीन की AI नियामक रणनीतियों को केवल विचारधारा के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इनके पीछे दोनों देशों की रणनीतिक स्थिति भी है।

आमोदेई जहां AI विकास की गति को नियंत्रित करने की बात करते हैं, वहीं एडवांस्ड चिप्स पर चीन के लिए निर्यात प्रतिबंध, तकनीकी चोरी रोकने और अमेरिकी बढ़त बनाए रखने जैसे उपायों का भी समर्थन करते हैं। चीन की ओर से इन प्रस्तावों को सिर्फ AI सुरक्षा के उपाय के बजाय अमेरिका की तकनीकी बढ़त बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

चीनी सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने आमोदेई के प्रस्ताव और अमेरिकी नीतियों की तुलना ‘कोल्ड वॉर’ के तरीके से की थी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने भी कहा कि डर, टकराव और नफरत पर आधारित प्रतिस्पर्धा वैश्विक AI गवर्नेंस के प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकती है।

क्या AI सुरक्षा और तकनीकी दौड़ के बीच संतुलन संभव है?

मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड क्रूगर के मुताबिक, चीन के आगे निकलने की आशंका को AI सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते के खिलाफ अंतिम तर्क नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार चीन भी ऐसा नहीं चाहता कि AI दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो।

क्रूगर ने एक संभावित समाधान के तौर पर एडवांस्ड कंप्यूटर चिप्स पर निगरानी का सुझाव दिया है। उनके मुताबिक, अत्यधिक शक्तिशाली AI विकसित करने के लिए बेहद उन्नत चिप्स की जरूरत होती है। इन चिप्स और उन्हें बनाने वाली फैक्ट्रियों पर प्रभावी निगरानी रखी जाए तो किसी भी देश के लिए छिपकर शक्तिशाली AI विकसित करना मुश्किल हो सकता है।

अमेरिका-चीन के नए AI संवाद में भी शुरुआत के लिए कुछ व्यावहारिक क्षेत्रों पर ध्यान देने की संभावना है। इनमें AI से जुड़ी गंभीर घटनाओं की सूचना देना, नियंत्रण से बाहर होने वाले AI एजेंट्स पर नियंत्रण और साइबर हमलावरों या गैर-सरकारी समूहों द्वारा AI के दुरुपयोग को रोकना शामिल है।

AI की मौजूदा बहस इसलिए केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि मशीनें भविष्य में इंसानों के लिए खतरा बनेंगी या नहीं। इसके साथ यह भी तय करना है कि AI की बढ़ती क्षमताओं की निगरानी कौन करेगा, सुरक्षा नियम कितने सख्त होंगे, बड़ी कंपनियों की भूमिका कितनी होगी और अमेरिका-चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था कैसे तैयार की जाएगी।

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