अमेरिका-ईरान वार्ता फिर बेनतीजा, कतर की मध्यस्थता भी नहीं लाई रंग; परमाणु कार्यक्रम और नौसैनिक नाकाबंदी पर अड़े दोनों पक्ष

वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए कतर की मध्यस्थता से हुई उच्चस्तरीय बातचीत एक बार फिर किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकी। बैठक से जुड़े तीन सूत्रों के मुताबिक, दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर कायम हैं और किसी भी पक्ष ने पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं। इस स्थिति ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने और दोबारा सैन्य टकराव की आशंकाओं को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मध्यावधि चुनावों के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने का आदेश दे सकते हैं। हालांकि, बातचीत विफल होने के बावजूद कतर ने मध्यस्थता के प्रयास बंद नहीं किए हैं। दोनों पक्षों के रुख को देखते हुए मध्यस्थता की प्रक्रिया भी मुश्किल होती जा रही है।
कई घंटों तक चली मैराथन बैठक
कतर के प्रमुख मध्यस्थ अली अल-थवादी ने न्यूयॉर्क में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और उनकी टीम के साथ कई घंटे तक बैठक की। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान कतर की ओर से तैयार किए गए दो पन्नों के समझौता प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा हुई।
प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान की उस मांग का रास्ता निकालना था, जिसमें वह अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी पूरी तरह हटाने की मांग कर रहा है। इसके साथ ही अमेरिका की उस मांग को भी प्रस्ताव में शामिल किया गया था, जिसमें ईरान से अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए कहा जा रहा है।
सोमवार शाम अल-थवादी ने वॉशिंगटन पहुंचकर ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर और अन्य अमेरिकी अधिकारियों से भी मुलाकात की। बैठक के एक छोटे हिस्से में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी शामिल हुए। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस बैठक को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की।
बातचीत को लेकर व्हाइट हाउस की उम्मीदों को झटका
सोमवार सुबह अमेरिकी अधिकारियों ने बातचीत को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। एक्सियोस समेत कई मीडिया संस्थानों को दी गई जानकारी में अधिकारियों ने वार्ता को सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में आगे बढ़ने की बात कही थी। अमेरिका की ओर से यह दावा भी किया गया कि ईरान ने परमाणु मुद्दे पर कुछ लचीलापन दिखाने के संकेत दिए हैं।
यह भी कहा गया था कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए ठोस कदम उठाता है तो ट्रंप प्रशासन प्रतिबंधों में राहत देने और ईरान के फ्रीज किए गए फंड को जारी करने पर विचार कर सकता है।
हालांकि, कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर कहा कि उन्होंने ईरान को कुछ भी ऑफर नहीं किया है। इस बयान के बाद बातचीत को लेकर बनी उम्मीदों को झटका लगा और वार्ता की दिशा भी प्रभावित हुई।
दोनों पक्षों की अलग-अलग शर्तें
मामले से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, सोमवार की वार्ता में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई। सूत्र ने दावा किया कि ईरान ऐसी मांगें कर रहा है जिन्हें अमेरिका स्वीकार नहीं कर सकता, जबकि अमेरिकी पक्ष को लगता है कि उसकी स्थिति मजबूत है और उसे समझौते की तत्काल जरूरत नहीं है।
इस बीच पाकिस्तान और मिस्र समेत क्षेत्र के अन्य मध्यस्थ देशों ने भी ईरान से अपने परमाणु कार्यक्रम में कुछ रियायतें देने का आग्रह किया है। हालांकि, ईरान का कहना है कि वह इस मुद्दे पर तभी विचार करेगा जब अमेरिका पिछले साल जून के समझौता ज्ञापन पर लौटने के लिए तैयार हो।
ईरान और ट्रंप के बयानों से बढ़ी तल्खी
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रजाई ने मंगलवार को ईरानी मीडिया से कहा कि ईरान अपनी शर्तें अमेरिका तक पहुंचा चुका है। उन्होंने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति किसी फैसले पर पहुंचने में सक्षम नहीं हैं। रजाई ने दावा किया कि ट्रंप ऐसी स्थिति में हैं जहां न तो वह प्रभावी तरीके से बातचीत कर पा रहे हैं और न ही युद्ध लड़ने की स्थिति में हैं।
वहीं, ट्रंप ने मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ईरान बेहद खराब स्थिति में है और उन्हें नहीं पता कि वह अभी हार मानने के लिए तैयार है या नहीं। ट्रंप ने कहा कि ईरान को अंततः परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जाएगा। दोनों पक्षों के इन बयानों के बीच आने वाले दिनों में कूटनीतिक समाधान की कोशिशें चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं।



