वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर तीसरा क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन श्रीनगर में आयोजित हुआ

श्रीनगर ( दस्तक डेस्क) : भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) ने आज जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (एफआरए) के कार्यान्वयन पर तीसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन का आयोजन किया। महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गोवा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा की, चुनौतियों पर चर्चा की और प्राथमिकता वाली कार्रवाइयों की पहचान की। इस सम्मेलन के साथ क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलनों की श्रृंखला संपन्न हुई।
इससे पहले, पहला सम्मेलन 10 सितंबर, 2026 को बेंगलुरु में और दूसरा सम्मेलन 9 अक्टूबर, 2026 को कोलकाता में आयोजित किया गया था। जम्मू और कश्मीर सरकार के जनजातीय कार्य विभाग के निदेशक श्री मोहम्मद मुमताज अली ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने क्षेत्र के दुर्गम इलाके, बिखरी हुई बस्तियों और मौसमी चरवाहा गतिविधियों पर प्रकाश डाला, तथा स्थानीय रूप से उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।
जम्मू-कश्मीर सरकार में जनजातीय कार्य, जल शक्ति तथा वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण मंत्री, माननीय श्री जावेद अहमद राणा ने इस बात पर जोर दिया कि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) वन-आश्रित समुदायों की गरिमा, आजीविका और भविष्य की रक्षा करता है। उन्होंने दावों का पारदर्शी एवं समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करने, विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वन अधिकारों की मान्यता, वन संरक्षण और सतत विकास को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए।
अपने मुख्य संबोधन में, जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अनंत प्रकाश पांडे ने बताया कि 31 अगस्त, 2026 तक देशभर में लगभग 54 लाख दावे प्राप्त हुए थे, जिनमें से 43.56 लाख (80.64 प्रतिशत) दावों का निपटारा किया जा चुका था। लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर 25.42 लाख अधिकार-पत्र वितरित किए गए थे, जबकि 10.45 लाख दावे लंबित थे और 18.13 लाख दावे खारिज किए जा चुके थे। उन्होंने जोर दिया कि प्रत्येक खारिज किए गए दावे के लिए तर्कसंगत आदेश होना चाहिए और इसकी सूचना दावेदार को दी जानी चाहिए। साथ ही, अपील करने के वैधानिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। उन्होंने राज्यों से लंबित दावों के शीघ्र निपटान और खारिज किए गए मामलों की समीक्षा के लिए जिला-वार कार्ययोजनाएं तैयार करने का आग्रह किया, विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और हिमाचल प्रदेश में इस दिशा में तेजी लाने पर जोर दिया गया।



