महान विचारक, प्रखर राष्ट्रवादी और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़ी ख़ास बातें

नई दिल्ली ( दस्तक डेस्क) : आज स्वामी दयानंद सरस्वती की पुण्यतिथि है और उन्हें पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा है। वे एक महान विचारक, प्रखर राष्ट्रवादी और आर्य समाज के संस्थापक थे। उनका जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के टंकारा में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका नाम मूल शंकर तिवारी था। उनके माता-पिता यशोदाबाई और लालजी तिवारी समर्पित हिंदू थे।छोटी उम्र में ही उनमें आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई और उन्होंने मूर्ति पूजा, अनुष्ठानों और अंधविश्वासों पर प्रश्न उठाए।
19 वर्ष की उम्र में सांसारिक जीवन त्यागकर, वे सत्य की खोज में लगभग 15 वर्षों (1845-1860) तक एक तपस्वी के रूप में भ्रमण करते रहे। उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानंद से शिक्षा प्राप्त की, जिन्होंने उन्हें हिंदू धर्म से भ्रष्ट प्रथाओं को समाप्त करने तथा वेदों के सच्चे अर्थ को पुनर्स्थापित करने के लिये काम करने का आग्रह किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती का दर्शन और उनका सामाजिक सुधार:
स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्ति पूजा, अस्पृश्यता, जाति-आधारित भेदभाव, बहुविवा, बाल विवाह और लैंगिक असमानता का विरोध किया। वह एक वर्गविहीन और जातिविहीन समाज में विश्वास करते थे जहाँ जाति जन्म के बजाय योग्यता पर आधारित होती थी।उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, दलित वर्गों के उत्थान, पुनः धर्म परिवर्तन के लिये शुद्धि आंदोलन तथा सती प्रथा और बाल विवाह उन्मूलन की पुरज़ोर वकालत की। उन्होंने “वेदों की ओर लौटो” पर ज़ोर देते हुए तर्क दिया कि सच्चा हिंदू धर्म वेदों में निहित है, जो तर्कसंगतता, समानता और सामाजिक न्याय को कायम रखते हैं।उनके विचार उनकी मौलिक कृति सत्यार्थ प्रकाश में संकलित हैं, जिसमें उन्होंने भ्रूण हत्या और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों की आलोचना की तथा वैदिक ज्ञान की वकालत की।
शैक्षिक योगदान:
उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का विरोध करते हुए आधुनिक, वैज्ञानिक तथा वैदिक शिक्षा की वकालत की। वर्ष 1886 में इन्होने गुरुकुलों, बालिका गुरुकुलों और दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना को प्रेरित किया, जिसमें महात्मा हंसराज के नेतृत्व में लाहौर में पहला DAV स्कूल स्थापित किया गया।

राष्ट्रवादी आंदोलन में भूमिका:
वह वर्ष 1876 में “स्वराज” का आह्वान करने वाले पहले व्यक्ति थे, जिसका प्रभाव बाद के नेताओं जैसे बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और महात्मा गांधी पर पड़ा।उन्होंने स्वदेशी (आर्थिक आत्मनिर्भरता) अपनाने एवं गौरक्षा के साथ हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में बढ़ावा दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती को सामाजिक-धार्मिक सुधार के प्रयासों के कारण समाज के रूढ़िवादी वर्गों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने आर्य समाज और DAV स्कूलों जैसी संस्थाओं के माध्यम से एक स्थायी विरासत छोड़ी, जिसका समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।



