उत्तराखंड

गुरु पूर्णिमा पर संत समाज तक पहुँचा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का संदेश, प्रदेशभर के आश्रमों एवं मठों में भेंट किए गए स्मृति-उपहार

देहरादून: गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से प्रदेशभर के संतों, महंतों, धर्माचार्यों एवं विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं को शुभकामना संदेश एवं स्मृति-उपहार भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया गया। प्रशासनिक अधिकारियों एवं शासन के प्रतिनिधियों ने विभिन्न जनपदों में पहुँचकर मुख्यमंत्री का संदेश संत समाज तक पहुँचाया।

पौड़ी गढ़वाल के स्वर्गाश्रम, परमार्थ निकेतन, गीता भवन, वेद निकेतन आश्रम, प्रेमवरणी आश्रम, त्रिमूर्ति आश्रम, रानी मंदिर एवं अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों पर संतों एवं महात्माओं को मुख्यमंत्री का संदेश और स्मृति-उपहार ससम्मान भेंट किए गए। रुद्रप्रयाग संगम स्थित रुद्रनाथ महादेव मंदिर में भी संतों एवं धर्माचार्यों से भेंट कर उन्हें गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ प्रेषित की गईं।

ऊधम सिंह नगर के जसपुर क्षेत्र में ठाकुरद्वारा मंदिर के पुजारी श्री भगवत दास जी, बहादरपुर स्थित बौद्ध मठ के डॉ. अश्व घोष जी, लोकतंत्र सेनानी श्री लोकमन सिंह जी, बड़ा मंदिर रहमापुर के महंत श्री रमेश गिरी जी तथा नवमी मंदिर के पुजारी श्री वीरेंद्र गिरी महाराज सहित अनेक संतों एवं धर्माचार्यों को मुख्यमंत्री की ओर से शुभकामना संदेश एवं स्मृति-उपहार प्रदान किए गए। वहीं नैनीताल जनपद के श्यामखेत (भवाली) स्थित नानतिन बाबा आश्रम के परमाध्यक्ष दंडी स्वामी श्री शंकरानन्द गिरी जी महाराज सहित उत्तरकाशी, मसूरी एवं अन्य जनपदों के संत समाज तक भी मुख्यमंत्री का संदेश पहुँचाया गया।

इस अवसर पर संत समाज ने मुख्यमंत्री को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए उत्तराखण्ड की सुख-समृद्धि, जनकल्याण, सामाजिक समरसता एवं आध्यात्मिक उन्नति की कामना की। साथ ही गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए समाज में उसके संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्यमंत्री की ओर से गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संत समाज तक शुभकामना संदेश पहुँचाने की इस पहल को भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं, सनातन मूल्यों एवं आध्यात्मिक विरासत के प्रति राज्य सरकार की गहरी आस्था और सम्मान का प्रतीक माना जा रहा है। राज्य सरकार निरंतर चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ बनाने, धार्मिक स्थलों के विकास, तीर्थ अवसंरचना के विस्तार तथा संत समाज के साथ सतत संवाद को प्राथमिकता देते हुए उत्तराखण्ड की आध्यात्मिक पहचान को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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