अंतरिक्ष में चीन का बड़ा दांव? सैटेलाइट में ईंधन भरने के दावे से मची हलचल, ट्रैकिंग डेटा ने भी उठाए सवाल

बीजिंग: अंतरिक्ष में चीन की एक कथित तकनीकी उपलब्धि ने दुनिया का ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि चीन ने कक्षा में ही अपने एक सैटेलाइट में ईंधन भरने का गुप्त ऑपरेशन किया। अगर यह दावा सही साबित होता है तो अंतरिक्ष में लंबे समय तक सैटेलाइट संचालित करने और उनकी क्षमता बनाए रखने की दिशा में यह महत्वपूर्ण तकनीकी कदम हो सकता है। हालांकि, उपलब्ध ऑर्बिटल ट्रैकिंग डेटा इस दावे पर सवाल भी खड़े कर रहा है।
सैटेलाइट रिफ्यूलिंग का क्या है दावा
‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक चीनी शोधकर्ताओं ने ऊंची कक्षा में मौजूद एक नेविगेशन सैटेलाइट के साथ इन-ऑर्बिट रिफ्यूलिंग ऑपरेशन किए जाने का दावा किया है। चीन की सरकारी मदद वाली डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन लेबोरेटरी और चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज की स्टडी में कहा गया है कि सर्विसिंग स्पेसक्राफ्ट ‘शिजियान-25’ ने फरवरी 2025 में ‘बेईडू-2 G7’ सैटेलाइट को 142 किलोग्राम प्रोपेलेंट ट्रांसफर किया।
दावे के अनुसार इस प्रक्रिया से नेविगेशन सैटेलाइट की काम करने की अवधि करीब आठ साल तक बढ़ गई। अंतरिक्ष में ही ईंधन भरने की तकनीक सफल होने पर सैटेलाइट को समय से पहले बदलने की जरूरत कम हो सकती है और इससे संचालन की लागत भी घट सकती है।
अमेरिका में क्यों बढ़ी चिंता
ऑर्बिट में सैटेलाइट को ईंधन उपलब्ध कराने की क्षमता का इस्तेमाल केवल सामान्य रखरखाव के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिक उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी स्पेस कमांड के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि ऐसी क्षमता अंतरिक्ष में संभावित टकराव या संघर्ष की स्थिति में रणनीतिक बढ़त दे सकती है।
सैटेलाइट की कक्षा और स्थिति को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर उन प्रणालियों के लिए जिनका इस्तेमाल संचार, नेविगेशन और अन्य रणनीतिक उद्देश्यों में होता है।
ट्रैकिंग डेटा ने दावे पर खड़े किए सवाल
हालांकि इस कथित ऑपरेशन की पुष्टि को लेकर सवाल बने हुए हैं। अमेरिकी स्पेस फोर्स के ऑर्बिटल ट्रैकिंग रिकॉर्ड्स के आधार पर स्वतंत्र एस्ट्रोफिजिसिस्ट जोनाथन मैकडॉवेल ने इस दावे पर संदेह जताया है।
उनके मुताबिक 2025 की शुरुआत में जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में ‘बेईडू-2 G7’ और ‘शिजियान-25’ के बीच करीब 10 लॉन्गिट्यूडिनल डिग्री का अंतर था। दोनों वस्तुओं की खिसकने की गति को देखते हुए उनके बीच बिना पता चले डॉकिंग करना बेहद मुश्किल माना जाता है। उन्होंने यह संभावना भी बताई कि अगर ऐसा ऑपरेशन हुआ हो तो ट्रैकिंग नेटवर्क द्वारा संबंधित वस्तुओं की पहचान में गलती हुई हो सकती है।
अगर सफल हुआ तो क्यों अहम होगी यह तकनीक
अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट सीमित मात्रा में ईंधन लेकर चलते हैं। यही ईंधन उनकी कक्षा को नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर रास्ता बदलने के काम आता है। समय के साथ ईंधन खत्म होने पर सैटेलाइट की उपयोगी अवधि भी प्रभावित होती है।
इन-ऑर्बिट रिफ्यूलिंग सफल होने पर सैटेलाइट को लंबे समय तक सक्रिय रखने की संभावना बढ़ सकती है। इसके अलावा किसी सैटेलाइट को कक्षा से हटाकर उसकी जगह नया सैटेलाइट भेजने की जरूरत भी कम हो सकती है।
अंतरिक्ष संघर्ष में बदल सकता है समीकरण
सैटेलाइट के सीमित ईंधन का एक रणनीतिक पहलू भी है। यदि किसी सैटेलाइट को दूसरे सैटेलाइट से संभावित टक्कर या किसी खतरे से बचने के लिए अपनी कक्षा बदलनी पड़े तो उसमें बड़ी मात्रा में ईंधन खर्च हो सकता है।
ऐसी स्थिति में किसी संभावित हमले या टक्कर का सिर्फ खतरा पैदा करना भी दूसरे सैटेलाइट को अपनी स्थिति बदलने के लिए मजबूर कर सकता है। इससे उसका ईंधन खर्च होगा और उसकी बाकी परिचालन अवधि प्रभावित हो सकती है।
जुलाई 2026 के एक लेख में पॉल सिज़मैन्स्की और कैलोएरो बोनासिया ने भी इन-ऑर्बिट सर्विसिंग और रिफ्यूलिंग जैसी क्षमताओं के संभावित रणनीतिक प्रभावों पर चर्चा की है। हालांकि, चीन के कथित रिफ्यूलिंग ऑपरेशन की वास्तविक सफलता को लेकर उपलब्ध ट्रैकिंग आंकड़ों और वैज्ञानिक दावों के बीच अभी अंतर बना हुआ है।



