इस्तीफा देने के बाद भी नहीं थमा विवाद! जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग का सवाल बरकरार, 20 जुलाई को संसद में पेश होगी जांच रिपोर्ट

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में महाभियोग की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जानकारी दी है कि आरोपों की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र के पहले दिन यानी 20 जुलाई को लोकसभा में पेश की जाएगी। रिपोर्ट पेश होने से पहले ही इस बात पर बहस तेज हो गई है कि इस्तीफा दे चुके पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया जारी रह सकती है या नहीं।
अप्रैल में दे चुके हैं इस्तीफा
जस्टिस यशवंत वर्मा अप्रैल 2025 में अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफे के बाद उन्होंने न्यायिक पद से जुड़ी सभी आधिकारिक जिम्मेदारियां, सरकारी सुविधाएं और आवास भी छोड़ दिया था। उनकी पेंशन अब तक जारी नहीं हुई है। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि पद छोड़ने के बाद महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया का भविष्य क्या होगा।
महाभियोग प्रस्ताव पर दोनों पक्षों ने किए थे हस्ताक्षर
जस्टिस वर्मा के खिलाफ सत्तापक्ष और विपक्ष के सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। हालांकि अब वे न्यायिक पद पर नहीं हैं और बार काउंसिल में नामांकन कर निजी वकालत भी शुरू कर चुके हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि जब संबंधित व्यक्ति पहले ही पद छोड़ चुका हो, तब महाभियोग की प्रक्रिया जारी रखने का संवैधानिक आधार क्या होगा।
लोकसभा में प्रस्ताव स्वीकार, राज्यसभा में नहीं मिला समर्थन
जुलाई 2025 में जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लोकसभा ने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए जांच समिति गठित कर दी थी, जबकि राज्यसभा में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
इससे पहले भी न्यायाधीशों के इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया अधूरी रह चुकी है। वर्ष 2011 में जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के इस्तीफे के बाद उनके खिलाफ गठित महाभियोग समिति भंग कर दी गई थी। वहीं जस्टिस सौमित्र सेन ने राज्यसभा में महाभियोग प्रक्रिया के दौरान इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद मामला आगे नहीं बढ़ सका।
संवैधानिक स्थिति पर अलग-अलग राय
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला कानूनी दृष्टि से काफी जटिल है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति को संबोधित होते ही प्रभावी हो जाता है, जबकि अन्य सरकारी पदों पर इस्तीफे के लिए स्वीकृति जरूरी होती है। संविधान के अनुच्छेद 217 और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों के अनुसार, न्यायाधीश संवैधानिक पदाधिकारी होते हैं, इसलिए उनके इस्तीफे की प्रक्रिया सामान्य सरकारी कर्मचारियों से अलग मानी जाती है।
नकदी मिलने के मामले से जुड़ा है विवाद
पिछले वर्ष मार्च में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने का मामला सामने आया था। हालांकि उन्होंने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपनी छवि खराब करने की साजिश बताया था। अब 20 जुलाई को संसद में जांच समिति की रिपोर्ट पेश होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी या इस मामले का संवैधानिक रूप से समापन माना जाएगा।



