डॉ. नंदन सिंह बिष्ट
पाँच वर्ष पहले का वह दिन आज भी मेरी स्मृति में उतना ही जीवित है।
पुष्कर सिंह धामी के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा हो चुकी थी। बहुतों के लिए वह घोषणा अप्रत्याशित थी। उत्तराखंड की राजनीति ने एक बार फिर पहाड़ के मौसम की तरह करवट ली थी। रात होते-होते बीजापुर गेस्ट हाउस जनसैलाब में बदल चुका था। चारों ओर बधाइयाँ थीं, उत्साह था, लगातार लोगों का आना-जाना था। कोरोना महामारी की दूसरी लहर का खतरा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। मैं और मेरे कुछ चिकित्सक साथी भी उन्हें बधाई देने के लिए वहाँ उपस्थित थे।
भीड़ के बीच उनकी नज़र मुझ पर पड़ी। मैंने अपने चेहरे की ओर इशारा करते हुए मास्क का संकेत किया। उन्होंने बिना कुछ कहे अपना हाथ बढ़ाया और मास्क अपने चेहरे पर लगा लिया।
उस रात उन्होंने जो मास्क पहना था, वह कुछ देर बाद उतर गया।
लेकिन आज, पाँच वर्ष बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि वह मास्क कभी उतरा ही नहीं।
बस उसका रूप बदल गया।

अब वह कपड़े का मास्क नहीं है। वह नकारात्मकता के संक्रमण से स्वयं को बचाने और अपनी प्रतिक्रिया को संयमित और संतुलित रखते हुए दूसरों तक पहुँचाने का एक अदृश्य मास्क बन गया है।
एक चिकित्सक होने के कारण मैं लोगों को केवल बोलते हुए नहीं देखता; मैं उनके शरीर की भाषा भी पढ़ता हूँ। पिछले पाँच वर्षों में उनके वैयक्तिक चिकित्सक के रूप में मैंने बार-बार महसूस किया कि वे होंठों से मुस्कराने से पहले आँखों से मुस्कराते हैं; सिर की हल्की-सी हरकत से सामने वाले का अभिवादन स्वीकार करते हैं; कंधों की सहज लय से संवाद करते हैं। कई बार मुझे लगा कि उन्होंने केवल बॉडी लैंग्वेज नहीं, बल्कि शरीर को ही संवाद का माध्यम बना लिया है। जैसे शब्दों से पहले आँखें बोलती हों, वाक्यों से पहले मौन संवाद करता हो। शायद यही उनकी बॉडी फिलॉसफी है। जहाँ शरीर केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसंयम का सबसे विश्वसनीय साक्ष्य बन जाता है।
उत्तराखंड की राजनीति पहाड़ों के मौसम की तरह है।क्षण भर में धूप से बादल और बादलों से तूफ़ान। ऐसी राजनीति में यदि कोई व्यक्ति अपने मनोभाव पर संयम, उत्साह और विनम्रता का एक अदृश्य मास्क चढ़ाए रख सके, तो वह केवल एक राजनीतिक शैली नहीं, बल्कि अध्ययन का विषय बन जाता है।
सबसे पहले मुझे खटीमा की वह सुबह याद आती है।
भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट बहुमत से सरकार बना चुकी थी, लेकिन स्वयं मुख्यमंत्री अपनी विधानसभा सीट हार गए थे। वातावरण में एक स्वाभाविक खामोशी थी। मैंने सहज ही कहा..
“कभी-कभी छोटी सड़क इसलिए बंद हो जाती है कि किसी को हाईवे से जाना होता है।”
उन्होंने मुस्कराकर पूछा
“डॉक्टर साहब, यह कौन-सी सर्जरी का रास्ता बता रहे हैं?”
मैंने कहा—
“आपकी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।”
वे शांत स्वर में बोले
“पार्टी जीत गई, मेरे लिए वही सबसे बड़ी बात है।”
एक चिकित्सक जानता है कि किसी व्यक्ति का वास्तविक चरित्र सफलता में नहीं, बल्कि आघात के बाद दिखाई देता है। कुछ ही समय बाद परिस्थितियाँ बदलीं। विधायक दल ने फिर उन पर विश्वास जताया। वे पुनः मुख्यमंत्री बने और उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुँचे।
उस दिन मुझे लगा कि राजनीति में कई बार सबसे लंबा रास्ता ही सबसे सीधा रास्ता होता है।समय बीतता गया।
मैंने उनके जीवन में एक और चीज़ देखी।अनुशासन।
पिछले तीन वर्षों से शाम के बाद भोजन न करना, नियमित योगाभ्यास, आध्यात्मिक अनुशासन और शरीर के प्रति निरंतर सजगता।ये बातें शायद कभी समाचार नहीं बनतीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी पूँजी अक्सर यही होती है। तनाव और विकार के बीच स्वयं को संतुलित रखना।
एक डॉक्टर जानता है कि शरीर केवल बीमारी का पता नहीं देता,वह व्यक्ति के चरित्र की भी सबसे ईमानदार रिपोर्ट लिखता है।
यहीं मुझे नीत्शे के उस दर्शन की याद आती है जिसमें शरीर को मनुष्य की चेतना, इच्छाशक्ति और आत्म-निर्माण का आधार माना गया है। एक चिकित्सक होने के नाते मैं भी शरीर को उसी दृष्टि से पढ़ता हूँ। शरीर झूठ कम बोलता है। उसकी चाल, उसकी मुद्रा, उसकी आँखें और उसका मौन। ये सब मिलकर व्यक्ति का दर्शन लिखते हैं।
शायद राजनीति भी अंततः शरीर का ही दर्शन है।
जो व्यक्ति अपने शरीर से संवाद नहीं कर सकता, वह परिस्थितियों से भी अधिक देर तक संवाद नहीं कर सकता।
फिर उत्तराखंड में वह समय आया जब भर्ती परीक्षाओं पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने युवाओं के विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई। बेरोजगार युवा सड़कों पर थे। वातावरण आरोपों, निराशा और आक्रोश से भरा हुआ था।
राजनीति का सामान्य तरीका यह होता है कि नेता दूरी बना ले, बयान जारी करे और समय के शांत होने की प्रतीक्षा करे।
लेकिन उन्होंने आंदोलनरत युवाओं के बीच जाने का निर्णय लिया।
मैंने उस दिन भी वही अदृश्य मास्क देखा।
वह संयम और आत्मविश्वास का मास्क था।
उस समय प्रदेश के युवाओं के मन में सबसे बड़ा संक्रमण अविश्वास का था। एक चिकित्सक जानता है कि बीमारी का उपचार केवल लक्षणों का नहीं होता,उसके कारणों का भी होता है। बाद में सशक्त नकल विरोधी कानून बना। भर्ती प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया गया। हजारों युवाओं को सरकारी नियुक्तियाँ मिलीं। स्वरोज़गार और स्टार्टअप को भी प्रोत्साहन मिला। इन प्रयासों का अंतिम मूल्यांकन जनता और इतिहास करेंगे,लोकतंत्र में वही सर्वोच्च निर्णायक है। लेकिन एक चिकित्सक की दृष्टि से मुझे यह व्यवस्था के उपचार का प्रयास लगा।
सिल्क्यारा की बात तो कभी भुलाई नहीं जा सकती।
सुरंग के भीतर इकतालीस श्रमिक फँसे थे। बाहर पूरा देश प्रतीक्षा कर रहा था। देश और विदेश के विशेषज्ञ, तकनीकी दल, बदलती रणनीतियाँ और हर गुजरते घंटे के साथ बढ़ती चिंता।
यह केवल एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं था।
यह धैर्य की परीक्षा थी।
उन दिनों मैंने राजनीति से अधिक नेतृत्व को काम करते देखा।
संकट की घड़ी में नेतृत्व का पहला दायित्व हर उत्तर जानना नहीं होता,उसका पहला दायित्व घबराहट को नियंत्रित रखना होता है। कई बार नेतृत्व का अर्थ केवल इतना होता है कि जब किसी के पास उत्तर न हो, तब भी पूरी टीम का धैर्य बनाए रखा जाए।
उन दिनों भी उनके चेहरे पर मुझे वही अदृश्य मास्क दिखाई देता रहा।
पिछले पाँच वर्षों में समान नागरिक संहिता, सशक्त नकल विरोधी कानून, महिलाओं के लिए आरक्षण, निवेश, आधारभूत संरचना, पारदर्शी भर्ती प्रक्रियाएँ और अनेक अन्य निर्णय चर्चा के विषय बने। इन सबका अंतिम मूल्यांकन समय और समाज करेंगे।
लेकिन यह लेख उपलब्धियों की सूची नहीं है।यह किसी सरकार का मूल्यांकन भी नहीं है।यह एक चिकित्सक की निजी डायरी का एक पन्ना है।

पाँच वर्ष पहले वह मास्क चेहरे पर था।
आज वह स्वभाव पर है।
एक चिकित्सक की दृष्टि से मैंने जाना कि शरीर केवल स्वास्थ्य या अस्वस्थता की स्थिति में सिर्फ़ रोग नहीं ढोता, वह विचार का भी वाहक होता है।
यदि विचार संयमित हो, तो शरीर उसका पहला साक्ष्य उपस्थित कर देता है।
शायद इसीलिए मुझे वह मास्क आज भी दिखाई देता है।
वह कपड़े का नहीं है।
वह संयम का है।
कोरोना ने मुझे एक चिकित्सकीय सूत्र दिया था।
“न संक्रमण लेना है, न संक्रमण देना है।”
पाँच वर्षों तक सार्वजनिक जीवन को निकट से देखते हुए मैंने पाया कि राजनीति में भी यही सबसे कठिन साधना है।
अपने भीतर नकारात्मकता का संक्रमण न आने देना।
यदि आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की राजनीति इस अदृश्य मास्क को नेतृत्व के एक रूपक के रूप में याद करे, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।
मेरे लिए वह केवल एक मास्क नहीं है।
वह एक चिकित्सक की आँखों से देखा गया संयम, नियम, आत्मसंवाद और नेतृत्व का दर्शन है।
और शायद यही बॉडी फिलॉसफी का सबसे सरल, सबसे मानवीय और सबसे कठिन रूप भी है।
(डॉ. नंदन सिंह बिष्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के वैयक्तिक चिकित्सक हैं)






