नाना पाटेकर की दरियादिली का भावुक किस्सा, दोस्त शिवाजी साटम की फीस बढ़वाने के लिए निर्माताओं से दो घंटे तक अड़े रहे अभिनेता

नई दिल्ली: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अपनी दमदार अदाकारी और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाते हैं। उनके व्यक्तित्व का एक भावुक पहलू उनके करीबी दोस्त और अभिनेता शिवाजी साटम ने साझा किया है। करीब 40 साल पुरानी दोस्ती को याद करते हुए शिवाजी ने बताया कि नाना ने न सिर्फ उन्हें हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि उनकी मेहनत के मुताबिक पारिश्रमिक दिलाने के लिए भी निर्माताओं से मोर्चा लिया। इतना ही नहीं, पत्नी के कैंसर से जूझने के दौरान भी नाना ने उनका साथ दिया और मुश्किल वक्त में एक सगे भाई की तरह मदद की।
नाना की याद में आयोजित सभा में शिवाजी साटम ने सुनाए किस्से
मुंबई के प्रभादेवी स्थित पी. एल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी परिसर में नाना पाटेकर की याद में आयोजित ‘अठवणीतले नाना’ नाम की शोकसभा में शिवाजी साटम ने अपनी दोस्ती से जुड़े कई अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि नाना के साथ उनका रिश्ता बेहद गहरा था। जब उन्हें नाना के निधन की खबर मिली, तो उन्हें इस पर विश्वास करना मुश्किल हो गया। शिवाजी के मुताबिक, नाना हमेशा चाहते थे कि उनके दोस्त को उसकी प्रतिभा के अनुरूप अवसर मिलें और वह अपने काम से अलग पहचान बनाए।
‘यशवंत’ में काम करने के लिए नाना ने मनाया था
शिवाजी साटम ने बताया कि हिंदी फिल्म ‘यशवंत’ में काम करने का अवसर दिलाने में नाना पाटेकर की अहम भूमिका थी। फिल्म में पुलिस अधिकारी के किरदार के लिए निर्माताओं ने शिवाजी से संपर्क किया था, लेकिन शुरुआत में वह यह भूमिका निभाने के इच्छुक नहीं थे। उनके इनकार के बाद निर्माताओं ने नाना से बात की।
इसके बाद नाना ने अपने खास अंदाज में शिवाजी को समझाया और फिल्म में काम करने के लिए राजी कर लिया। शिवाजी के मुताबिक, नाना चाहते थे कि वह हिंदी सिनेमा में अपनी प्रतिभा दिखाएं और उन्हें बेहतर अवसर मिलें। दोस्त को आगे बढ़ाने की उनकी यही सोच उनके रिश्ते की खासियत थी।
दोस्त की फीस बढ़वाने के लिए निर्माताओं से भिड़ गए नाना
नाना पाटेकर की दरियादिली का एक और दिलचस्प किस्सा शिवाजी साटम की फीस से जुड़ा है। शिवाजी ने बताया कि जब नाना को पता चला कि उन्हें फिल्म के लिए कितना पारिश्रमिक दिया जा रहा है, तो वह नाराज हो गए। उनका मानना था कि शिवाजी को उनकी मेहनत और प्रतिभा के हिसाब से ज्यादा फीस मिलनी चाहिए।
शिवाजी ने नाना को इस मामले में दखल देने से रोकने की कोशिश की, लेकिन वह पीछे नहीं हटे। उन्होंने निर्माताओं के सामने अपने दोस्त के उचित पारिश्रमिक का मुद्दा उठाया और करीब दो घंटे तक अपनी बात पर अड़े रहे। इस घटना से पता चलता है कि नाना अपने करीबी लोगों के हक के लिए खुलकर आवाज उठाते थे। उनके लिए दोस्ती सिर्फ साथ वक्त बिताने तक सीमित नहीं थी, बल्कि जरूरत पड़ने पर दोस्त के लिए खड़े होने का नाम भी थी।
पत्नी को कैंसर हुआ तो नाना ने मुश्किल वक्त में दिया साथ
शिवाजी साटम ने नाना पाटेकर से जुड़ा सबसे भावुक किस्सा अपनी पत्नी की बीमारी के दिनों का सुनाया। उन्होंने बताया कि जब उनकी पत्नी को कैंसर होने का पता चला, उस समय वह फिल्म ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ की शूटिंग कर रहे थे। परिवार पर आए इस संकट के बीच उनके लिए काम और पत्नी की देखभाल के बीच संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो गया था। हालात ऐसे थे कि उन्होंने फिल्म छोड़ने तक के बारे में सोच लिया था।
ऐसे समय में नाना पाटेकर ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। शिवाजी के मुताबिक, नाना ने निर्देशक पार्थो घोष और फिल्म से जुड़े लोगों से बात की, ताकि उन्हें अपनी पत्नी के साथ समय बिताने का मौका मिल सके। इसके बाद उनका शूटिंग शेड्यूल इस तरह तय किया गया कि वह दोपहर 12 बजे सेट पर पहुंचें और रात 8 बजे तक घर लौट सकें। इससे उन्हें अपने काम के साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभाने में मदद मिली।
‘सगा भाई भी शायद इतना नहीं करता’, शिवाजी ने याद किया साथ
शिवाजी साटम ने भावुक होते हुए कहा कि नाना पाटेकर ने उनके लिए जितना किया, उतना शायद उनका सगा भाई भी नहीं कर पाता। उन्होंने बताया कि नाना कभी भी अचानक फोन करके उन्हें अपने फार्म पर बुला लेते थे। उनके रिश्ते में अपनापन और सहजता हमेशा बनी रही।
शिवाजी की इन यादों से नाना पाटेकर की शख्सियत का वह पहलू सामने आता है, जो पर्दे पर निभाए गए उनके किरदारों से अलग था। दोस्त की फीस के लिए निर्माताओं के सामने डटकर खड़े होना हो या बीमारी के कठिन दौर में उसके परिवार का सहारा बनना, नाना ने अपने व्यवहार से दोस्ती का गहरा अर्थ दिखाया। शिवाजी साटम के संस्मरणों में नाना एक ऐसे दोस्त के रूप में सामने आते हैं, जो मुश्किल समय में केवल सांत्वना नहीं देते थे, बल्कि मदद के लिए ठोस कदम भी उठाते थे।



