पेट्रोल की दौलत और अरबों के हथियार भी नहीं आए काम? हूती हमलों के बीच सऊदी अरब क्यों पड़ा अकेला, पाकिस्तान-तुर्किये से अमेरिका तक ने बनाई दूरी

रियाद: तेल से मिली अपार संपत्ति और अमेरिका से खरीदे गए अत्याधुनिक हथियारों के बावजूद सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच सुरक्षा को लेकर बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने राजधानी रियाद और बंदरगाह शहर यान्बु में तेल से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बनाने का दावा किया है। हमलों के बाद रियाद में कई घंटे तक धुआं दिखाई देने और हवाई यातायात प्रभावित होने की खबर सामने आई।
सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका के प्रमुख सुरक्षा साझेदारों में रहा है और उसने रक्षा क्षेत्र में भारी निवेश किया है। इसके बावजूद मौजूदा संघर्ष में उसे तत्काल सैन्य मदद को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
हूती विद्रोहियों ने रियाद और यान्बु को बनाया निशाना
हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने टेलीग्राम पर जारी बयान में दावा किया कि सऊदी अरब की ओर से यमन की राजधानी सना को निशाना बनाए जाने के जवाब में हूती बलों ने दो सैन्य अभियान चलाए।
हूती प्रवक्ता के मुताबिक, पहले अभियान में रियाद के संवेदनशील ठिकानों पर बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। दूसरे अभियान में यान्बु में सऊदी तेल कंपनी अरामको की सुविधाओं को निशाना बनाया गया। हूती पक्ष ने दावा किया कि इन हमलों से सऊदी अरब की सैन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचा।
हमलों के शुरुआती घंटों में हूती विद्रोहियों ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली थी, लेकिन बाद में प्रवक्ता ने दोनों अभियानों को स्वीकार किया।
रियाद में आग और धुएं से मचा हड़कंप
रिपोर्ट के मुताबिक, रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास एक ईंधन डिपो में आग लग गई। यहां अरामको के ईंधन टैंक को ड्रोन हमले में नुकसान पहुंचने की बात सामने आई।
हमले के बाद राजधानी में कई घंटे तक धुएं का गुबार दिखाई देता रहा। लोगों के बीच भी अफरा-तफरी की स्थिति बनी रही। सुरक्षा अलर्ट के बीच लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई।
हवाई अड्डे पर कुछ समय के लिए उड़ानों के आने-जाने पर भी असर पड़ा। कई उड़ानों को रद्द किया गया और लैंडिंग तथा टेकऑफ पर रोक लगाई गई। देश के शीर्ष नेताओं की सुरक्षा भी बढ़ाई गई। कुछ समय बाद जब अतिरिक्त हमले नहीं हुए तो हवाई अड्डों का संचालन फिर शुरू कर दिया गया।
हूती हमलों की बढ़ती क्षमता बनी चुनौती
हूती विद्रोहियों ने हाल के दिनों में अपने सैन्य अभियान तेज किए हैं। उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों का दायरा बढ़ने के साथ ही लाल सागर के आसपास उनकी रणनीतिक मौजूदगी भी महत्वपूर्ण हो गई है।
हूती विद्रोहियों की ओर से मिसाइल और ड्रोन के इस्तेमाल ने सऊदी अरब के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी की है, जिसमें दूर से किए जाने वाले हमलों को रोकना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। तेल सुविधाओं और दूसरे संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाए जाने से सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था और समुद्री व्यापार को लेकर भी चिंता बढ़ी है।
पाकिस्तान और तुर्किये से मदद मांगने की चर्चा
रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए पाकिस्तान और तुर्किये से मदद मांगी। इस दौरान दोनों देशों के साथ हुए मक्का समझौते का भी हवाला दिया गया।
हालांकि, दोनों देशों की ओर से इस संघर्ष में तत्काल सैन्य हस्तक्षेप को लेकर अलग रुख सामने आया। बताया गया कि समझौते की शर्तों के तहत सहयोग को किसी नए संघर्ष में दुश्मन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से जोड़ना उचित नहीं माना गया, क्योंकि हूती-सऊदी संघर्ष पहले से चला आ रहा विवाद है।
अमेरिका ने भी सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी रखी
सऊदी अरब ने अमेरिका से भी मदद की मांग की। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को किसी नए संघर्ष में शामिल करने से इनकार किया।
अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब का प्रमुख सुरक्षा साझेदार रहा है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी व्यापक रहा है। लेकिन मौजूदा क्षेत्रीय संघर्षों के बीच वाशिंगटन की ओर से सीधे नए सैन्य मोर्चे में शामिल होने से दूरी बनाए रखने की बात सामने आई है।
इस स्थिति ने सऊदी अरब के सामने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय साझेदारियों को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है।
सऊदी अरब के सामने अब सबसे बड़ा सवाल
हूती विद्रोहियों के लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि सऊदी अरब अपने महत्वपूर्ण शहरों, तेल प्रतिष्ठानों और बंदरगाहों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित करेगा।
तेल से मिलने वाली विशाल आय ने सऊदी अरब को रक्षा और बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च करने की क्षमता दी है। अमेरिका से बड़ी मात्रा में हथियार खरीदने के बावजूद दूर से होने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकना एक अलग तरह की सुरक्षा चुनौती साबित हो रहा है।
मौजूदा घटनाक्रम में सऊदी अरब को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों से अपेक्षित सैन्य समर्थन हासिल करने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में हूती विद्रोहियों के साथ संघर्ष केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर सऊदी अरब की ऊर्जा सुविधाओं, हवाई यातायात और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।



