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NCERT की नई किताब में टैक्स से राष्ट्र निर्माण तक की पढ़ाई, कक्षा 9 के छात्रों को पढ़ाए जाएंगे ये अहम विषय

नई दिल्ली: कक्षा 9 के छात्रों के लिए एनसीईआरटी ने सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक जारी की है। किताब के दूसरे भाग ‘Understanding Society: India and Beyond’ में व्यक्तिगत आयकर, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, स्टार्टअप और उद्यमिता जैसे विषयों को शामिल किया गया है। राजनीतिक विज्ञान से जुड़े अध्यायों में भारतीय शासन परंपराओं, नीति निर्माण और राष्ट्र निर्माण पर भी जोर दिया गया है। मंगलवार को जारी किताब में नई कर व्यवस्था के तहत अलग-अलग आयकर स्लैब के आधार पर वास्तविक कर गणना के उदाहरण भी दिए गए हैं।

टैक्स भुगतान को नागरिक जिम्मेदारी से जोड़ा

किताब के ‘Managing Your Personal Finances’ अध्याय में आयकर के अलग-अलग स्लैब और उदाहरणों के जरिए छात्रों को टैक्स की गणना समझाई गई है। इसमें समय पर और ईमानदारी से टैक्स का भुगतान करना नागरिकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बताया गया है। साथ ही यह भी समझाया गया है कि सरकार को मिलने वाला कर राजस्व देश के विकास में किस तरह योगदान देता है।

इसी अध्याय में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को कम आय वाले परिवारों के लिए वित्तीय सुरक्षा के उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया है। किताब में स्वास्थ्य बीमा, टैक्स और व्यक्तिगत वित्तीय प्रबंधन को नागरिकों की व्यापक आर्थिक जिम्मेदारियों से जोड़कर समझाया गया है।

लिज्जत पापड़ से ओबेरॉय तक, उद्यमिता के उदाहरण

‘From Ideas to Startups’ अध्याय में छात्रों को उद्यमिता और स्टार्टअप की दुनिया से परिचित कराया गया है। इसमें लिज्जत पापड़ की सफलता की कहानी शामिल है। किताब के अनुसार, 1959 में मुंबई की सात गृहिणियों ने 80 रुपये की शुरुआती पूंजी से इसकी शुरुआत की थी। आगे चलकर यह पहल एक सहकारी संस्था में बदल गई, जिसमें 45,000 सदस्य जुड़े और वर्ष 2023 तक इसका रिपोर्टेड टर्नओवर 1,600 करोड़ रुपये बताया गया है।

किताब में पद्म भूषण से सम्मानित होटल व्यवसायी मोहन सिंह ओबेरॉय के जीवन और कारोबारी सफर का भी उल्लेख किया गया है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक होटल में डेस्क क्लर्क के रूप में की थी, जहां उन्हें 50 रुपये प्रति माह वेतन मिलता था। इसके बाद उन्होंने अपना कारोबार खड़ा किया और भारत की बड़ी होटल श्रृंखलाओं में से एक की नींव रखी। इन उदाहरणों के जरिए छात्रों को वित्तीय समझ, नागरिक जिम्मेदारी, उद्यमिता और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों को व्यावहारिक तरीके से समझाने का प्रयास किया गया है।

सातवीं सदी के बाद के आक्रमण और प्रतिरोध का जिक्र

नई सामाजिक विज्ञान की किताब में भारतीय उपमहाद्वीप में सातवीं सदी के बाद हुए विभिन्न आक्रमणों और उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है। इसमें आक्रमणों के पीछे क्षेत्रीय विस्तार के साथ धार्मिक उद्देश्यों का भी जिक्र किया गया है।

किताब के दूसरे भाग में ‘Resistance and Resilience (1000-1700 ईस्वी)’ नाम से एक अध्याय है। इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए प्रतिरोध के कई उदाहरण शामिल किए गए हैं। चालुक्य वंश की रानी नायकी देवी और उल्लाल की रानी अब्बक्का चौटा जैसी अपेक्षाकृत कम चर्चित महिला शासकों का भी इसमें उल्लेख है।

किताब के अनुसार, रानी नायकी देवी ने 1178 में माउंट आबू के पास कासहरड़ा में मुहम्मद गौरी को पराजित किया था। इसके अलावा हिंदू शाही शासकों, चंदेलों, सोलंकियों और चौहानों द्वारा तुर्क आक्रमणकारियों के खिलाफ किए गए प्रतिरोध का भी विवरण दिया गया है।

सिख गुरुओं की शहादत को भी पाठ्यक्रम में जगह

अध्याय में सिख समुदाय के प्रतिरोध तथा गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर की शहादत का भी उल्लेख किया गया है। किताब के अनुसार, सिख गुरुओं के बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण 17वीं सदी की शुरुआत से मुगल शासन ने उनके मामलों में हस्तक्षेप बढ़ाया।

इसमें जहांगीर के शासनकाल में गुरु अर्जन देव और औरंगजेब के शासनकाल में वर्ष 1675 में गुरु तेग बहादुर को मृत्युदंड दिए जाने को सिख इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं के रूप में बताया गया है।

महाराणा प्रताप और अहोम प्रतिरोध का भी उल्लेख

पाठ्यपुस्तक में वर्ष 1582 में उदयपुर के पास हुए देवैर के युद्ध का भी जिक्र है। किताब के मुताबिक, इस युद्ध में मेवाड़ में मुगल सेना की कई महत्वपूर्ण चौकियां ध्वस्त हुईं और महाराणा प्रताप को मेवाड़ के बड़े हिस्से पर दोबारा नियंत्रण हासिल करने में मदद मिली। उनके उत्तराधिकारी महाराणा अमर सिंह ने भी मुगल विस्तार के खिलाफ प्रतिरोध जारी रखा।

मुगलों के खिलाफ जाटों के विद्रोह की कहानी

किताब में मुगल साम्राज्य के खिलाफ जाटों के प्रतिरोध का भी विवरण दिया गया है। इसके अनुसार, गंगा-यमुना दोआब में रहने वाले जाटों पर भारी कर और शोषण का दबाव था। वर्ष 1669 में गोकुल जाट के नेतृत्व में उन्होंने विद्रोह किया। इसके बाद 1686 में सिनसिनी और सोगर के जमींदारों के नेतृत्व में दूसरा विद्रोह हुआ।

पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि भारी कर और शोषण के साथ औरंगजेब की धार्मिक नीतियों ने जाटों में असंतोष बढ़ाया। मुगल सेना को वर्ष 1669 के विद्रोह को दबाने में कई महीने लगे।

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