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NEET विवाद के बाद आरक्षण पर सोशल मीडिया में नई बहस, 48 घंटे में 53 लाख फॉलोअर्स का दावा करने वाला अभियान चर्चा में

नई दिल्ली: नीट पेपर लीक विवाद के बाद अब आरक्षण के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर नई डिजिटल बहस तेज हो गई है। इंस्टाग्राम पर शुरू किए गए एक अभियान ने कम समय में बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। अभियान से जुड़े लोगों का दावा है कि इससे लाखों यूजर्स जुड़ चुके हैं, जबकि आरक्षण के समर्थन और विरोध, दोनों पक्षों की सक्रियता भी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार बढ़ रही है। इसके चलते यह मुद्दा एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।

48 घंटे में 53 लाख फॉलोअर्स का दावा

जानकारी के अनुसार, ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन (RHA)’ नाम से बनाए गए एक इंस्टाग्राम पेज ने महज 48 घंटे के भीतर 53 लाख से अधिक फॉलोअर्स हासिल करने का दावा किया है। तेजी से बढ़ती डिजिटल भागीदारी के कारण यह अभियान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि इसे केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि आगे सार्वजनिक स्तर पर भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की तैयारी की बात भी सामने आई है।

युवाओं को जोड़ने के लिए डिजिटल नेटवर्क पर जोर

बताया गया है कि इस डिजिटल अभियान की शुरुआत वेदांश त्यागी नाम के एक यूजर ने की है। अभियान से जुड़े समूह ने वेबसाइट, ऑनलाइन सदस्यता और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाने की दिशा में भी पहल शुरू की है। सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ती भागीदारी के चलते यह अभियान युवाओं के बीच तेजी से चर्चा में आया है।

विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग रख रहे अपनी राय

अभियान के इंस्टाग्राम पेज पर अलग-अलग राज्यों के युवाओं ने अपनी राय साझा की है। कई यूजर्स ने स्वयं को सामान्य वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक और अन्य सामाजिक वर्गों से जुड़ा बताते हुए अपने विचार व्यक्त किए हैं। इससे यह बहस विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंचती दिखाई दे रही है और अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।

अभियान की प्रमुख मांगें क्या हैं?

अभियान से जुड़े लोगों की प्रमुख मांगों में जाति आधारित आरक्षण समाप्त करने, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मेरिट आधारित चयन व्यवस्था लागू करने, सभी विद्यार्थियों के लिए समान शिक्षा प्रणाली सुनिश्चित करने तथा सरकारी प्रक्रियाओं में जाति आधारित पहचान की भूमिका कम करने की बात शामिल है। इसके साथ ही समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की भी मांग उठाई जा रही है।

आरक्षण समर्थक पक्ष भी सोशल मीडिया पर सक्रिय

दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थन में भी कई सोशल मीडिया अभियान और पेज सामने आए हैं। आरक्षण समर्थक वर्ग का कहना है कि जब तक सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते, तब तक आरक्षण व्यवस्था की आवश्यकता बनी रहेगी। उनका तर्क है कि आरक्षण केवल शिक्षा और रोजगार का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने का संवैधानिक माध्यम भी है। इसी वजह से सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के बीच लगातार बहस और विचार-विमर्श जारी है।

विशेषज्ञों की क्या है राय?

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी बात व्यापक स्तर पर रखने का प्रभावी मंच दिया है। हालांकि किसी भी संवेदनशील सामाजिक मुद्दे के प्रभाव का आकलन केवल ऑनलाइन भागीदारी के आधार पर नहीं किया जा सकता। ऐसे विषयों पर संवैधानिक प्रावधान, कानूनी प्रक्रिया और सार्वजनिक विमर्श भी समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। फिलहाल आरक्षण को लेकर शुरू हुई यह डिजिटल बहस देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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