पीएम की ‘सोना ना खरीदने’ की अपील का दिखा मिला-जुला असर
पीएम के बयान पर सराफा कारोबारियों ने साधी चुप्पी, बोले संरक्षक पीएम के बयान को गलत दिखाया जा रहा।
गाजियाबाद। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक साल तक सोना ना खरीदने की अपील का शहर में मिला-जुला असर दिख रहा है। सराफा व्यापारी बोले कि प्रधानमंत्री की अपील जरूर कोई बड़ी वजह होगी तभी की है। बस दुकानदारों कर्मचारी आदि के बारे में भी सोचना चाहिए। वहीं अधिकांश सराफा कारोबारियों ने पीएम मोदी की इस अपील पर प्रतिक्रिया देने से बचने की कोशिश की। कुछ विशेषज्ञों ने इसको पीएम मोदी की दूरगामी सोच बताया। वहीं अधिकांश सराफा कारोबारियों ने पीएम की अपील पर चुप्पी साध ली है।
क्यों सोने की खरीदारी पर है चिंता?
गाजियाबाद सराफा एसोसिएशन संरक्षक राजकिशोर गुप्ता का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है। हर साल हम अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा सोना खरीदने में खर्च कर देते हैं। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। प्रधानमंत्री की अपील का मुख्य उद्देश्य इसी आयात को कम करना है ताकि देश का पैसा विदेश जाने के बजाय यहीं रहे। रुपये को मिलेगी मजबूती और बढ़ेगा विदेशी मुद्रा भंडार उन्होंने कहा कि अगर भारतीय एक साल तक सोने की खरीदारी कम या बंद कर देते हैं, तो सबसे बड़ा असर हमारे इंपोर्ट बिल पर पड़ेगा। कम आयात का मतलब है डॉलर की कम मांग। जब डॉलर की मांग कम होगी, तो भारतीय रुपये पर दबाव घटेगा और वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मजबूत होगा। इससे सरकार के करंट अकाउंट डेफिसिट को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी।
अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार
हिंडन पार सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष नकुल वर्मा ने बताया कि मौजूदा समय में भारतीयों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा सोने में डेड इन्वेस्टमेंट के रूप में पड़ा है। अगर लोग इस पूंजी को बैंकों की एफडी, एसआईपी, शेयर बाजार या सरकारी योजनाओं में निवेश करें, तो बैंकों के पास नकदी बढ़ेगी। इससे उद्योगों को सस्ता लोन मिलेगा। कंपनियों का विस्तार होगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
ज्वेलरी सेक्टर के लिए कड़ी चुनौती
बुलियन ज्वैलर्स एसोसिएशन के महामंत्री डॉक्टर संजीव अग्रवाल ने कहा कि पीएम मोदी की अपील ‘सोना खरीदारी बंद करने’ का एक नकारात्मक पहलू भी है। भारत में ज्वेलरी उद्योग से लाखों कारीगर और छोटे कारोबारी जुड़े हैं। अगर अचानक मांग बंद होती है, तो इन लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि सोने से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय निवेश के संतुलित विकल्पों को चुनना ज्यादा व्यावहारिक है। इससे देशभर के करीब 6 करोड़ परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा होगा।

बदलता नजरिया: निवेश का नया रास्ता
रमते राम रोड स्थित एक सराफा कारोबारी का कहना है कि आज की नई पीढ़ी पहले ही फिजिकल गोल्ड के बजाय डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ और अन्य वित्तीय साधनों की ओर रुख कर रही है। भारत में सोने को सिर्फ निवेश नहीं बल्कि भावना और परंपरा से जोड़कर देखा जाता है, जिसे रातों-रात बदलना कठिन है। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील एक बड़ा सांकेतिक बदलाव ला सकती है, जो भारतीयों को निष्क्रिय निवेश से निकालकर उत्पादक निवेश की दिशा में ले जा सकती है।



