अद्धयात्मजीवनशैली

निर्जला एकादशी व्रत 2026: दशमी से शुरू हो जाती है तैयारी, जानें नियम और क्या करें-क्या नहीं

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने पर वर्ष भर की 24 एकादशियों के बराबर फल प्राप्त होता है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा, लेकिन इसकी तैयारी दशमी तिथि से ही शुरू हो जाती है।

दशमी से ही शुरू होती है व्रत की तैयारी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का पूर्ण फल तभी मिलता है जब श्रद्धालु दशमी तिथि से ही संयम और नियमों का पालन शुरू कर दें। इस दिन भोजन और दिनचर्या में विशेष सावधानी रखने की सलाह दी जाती है ताकि अगले दिन व्रत में किसी प्रकार की कठिनाई न हो।

सात्विक भोजन और संयम का पालन जरूरी
दशमी तिथि के दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस दिन प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज करने की परंपरा है। सूर्यास्त से पहले हल्का भोजन कर लेना उचित माना जाता है और उसके बाद अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। कई श्रद्धालु दशमी की रात से ही जल का त्याग कर देते हैं ताकि अगले दिन निर्जला व्रत का पालन पूरी निष्ठा से हो सके।

व्रत से पहले स्नान और शुद्धता का महत्व
मान्यता है कि एकादशी के दिन बाल धोना शुभ नहीं माना जाता। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को दशमी तिथि में ही स्नान कर लेना चाहिए और बाल धो लेना चाहिए ताकि व्रत के दिन किसी प्रकार की असुविधा न हो और नियमों का पालन सुचारू रूप से किया जा सके।

तुलसी दल और विष्णु पूजा के नियम
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है। बिना तुलसी के पूजा अधूरी मानी जाती है, लेकिन एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना या पौधे को स्पर्श करना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि में ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी को दूर से प्रणाम कर दीपक अर्पित किया जा सकता है।

व्रत संकल्प और पारण का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दशमी की रात भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्रद्धा और नियमों के साथ लिया गया यह संकल्प व्रत की सफलता का आधार माना जाता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है और तब तक सभी नियमों का पालन अनिवार्य माना गया है।

आध्यात्मिक महत्व और मान्यता
निर्जला एकादशी को केवल उपवास नहीं बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का महापर्व माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, जप और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत से जीवन में सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

Related Articles

Back to top button