
नई दिल्ली: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी दावों-प्रतिदावों के बीच अब एक नया नारा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। ‘56 नहीं, 61’ के नारे ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। इस नारे को लेकर विभिन्न राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं, जिससे राज्यसभा चुनाव के समीकरणों को लेकर अटकलों का दौर भी तेज हो गया है।
18 जून को मतदान, सभी दलों की नजर नतीजों पर
राज्यसभा चुनाव के लिए 18 जून को मतदान होना है। चुनाव से पहले महागठबंधन और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। महागठबंधन का कहना है कि उसके पास दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है, जबकि विपक्षी खेमे का भी दावा है कि चुनाव में राजनीतिक परिस्थितियां आखिरी समय तक बदल सकती हैं।
‘56 नहीं, 61’ के नारे ने बढ़ाई राजनीतिक उत्सुकता
झारखंड विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार महागठबंधन के पास 56 विधायकों का समर्थन है। यही संख्या दोनों उम्मीदवारों की जीत के लिए पर्याप्त मानी जा रही है। इसके बावजूद ‘56 नहीं, 61’ का नारा सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चाओं को नया आयाम मिल गया है। माना जा रहा है कि यह नारा संभावित अतिरिक्त समर्थन या राजनीतिक संदेश की ओर संकेत कर सकता है।
क्रॉस वोटिंग की अटकलों ने बढ़ाया रोमांच
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनावों में कई बार क्रॉस वोटिंग परिणामों को प्रभावित करती रही है। ऐसे में कुछ अतिरिक्त वोटों की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में उत्सुकता बढ़ा दी है। हालांकि किसी भी दल की ओर से इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की गई है।
विधानसभा का गणित महागठबंधन के पक्ष में
81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में महागठबंधन स्पष्ट बहुमत की स्थिति में है। संख्या बल के आधार पर दोनों सीटों पर उसकी स्थिति मजबूत दिखाई देती है। इसके बावजूद गोपनीय मतदान और राजनीतिक रणनीतियों को देखते हुए कोई भी दल जोखिम लेने के मूड में नहीं है।
विधायकों को एकजुट रखने में जुटे दल
चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। लगातार बैठकों, संवाद कार्यक्रमों और रणनीतिक चर्चाओं के जरिए दल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न न हो। इसी वजह से चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां लगातार बढ़ी हुई हैं।
सिर्फ संख्या नहीं, सियासी ताकत की भी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव केवल संख्या बल का मुकाबला नहीं होता, बल्कि यह राजनीतिक एकजुटता, संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व की प्रभावशीलता की भी परीक्षा होता है। झारखंड में इस बार चुनाव को लेकर जिस तरह की चर्चाएं हो रही हैं, उससे स्पष्ट है कि सभी दल इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर चल रहे हैं।
अब सभी की निगाहें 18 जून को होने वाले मतदान और उसके बाद आने वाले परिणामों पर टिकी हैं। इसके बाद ही साफ हो सकेगा कि ‘56 नहीं, 61’ का नारा महज राजनीतिक संदेश था या इसके पीछे कोई बड़ा चुनावी संकेत छिपा हुआ था।



