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सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी: NCSC अदालत नहीं, सिर्फ जांच, सलाह और सिफारिश कर सकता है; बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार नहीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) की संवैधानिक शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि आयोग सेवा संबंधी मामलों में बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत आयोग की भूमिका शिकायतों की जांच, सलाह और सिफारिश देने तक सीमित है। उसे किसी अदालत की तरह विवादों का अंतिम निपटारा करने या अपने आदेश लागू कराने का अधिकार प्राप्त नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुसूचित जातियों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों की जांच कर सकता है और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है, लेकिन उसके निर्देश कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।

जांच के लिए सिविल कोर्ट जैसी सीमित शक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग को जांच के दौरान सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां अवश्य प्राप्त हैं। इनमें गवाहों को तलब करना, दस्तावेज मंगाना और साक्ष्य दर्ज करना शामिल है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि ये अधिकार केवल जांच प्रक्रिया तक सीमित हैं और इनके आधार पर आयोग किसी विवाद का अंतिम फैसला नहीं सुना सकता।

पीठ ने कहा कि आयोग जांच पूरी होने के बाद अपनी रिपोर्ट और सिफारिश केंद्र या राज्य सरकार को भेज सकता है, लेकिन वह न्यायिक आदेश जारी करने वाली संस्था नहीं है।

NCSC की दलील सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की ओर से तर्क दिया गया कि नियमों में ‘सुरक्षा’ शब्द का उल्लेख है, जिसका उद्देश्य कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराना भी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि संवैधानिक प्रावधान आयोग को न्यायिक शक्तियां नहीं देते। आयोग केवल सिफारिश कर सकता है, लेकिन किसी अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता।

पदोन्नति विवाद से जुड़ा था मामला

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 28 जुलाई को सुनाया। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें मुंबई पोर्ट अथॉरिटी को एक अनुसूचित जाति कर्मचारी को पदोन्नति का लाभ और बकाया वेतन देने के लिए एनसीएससी के निर्देश को सही माना गया था।

मामला माधवी के. चंदोरकर नामक कर्मचारी से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 1997 में मुंबई पोर्ट अथॉरिटी में नौकरी शुरू की थी। वर्ष 2002 के एक कार्यालय ज्ञापन के आधार पर उन्हें आरक्षण नीति के तहत स्टेनोग्राफर ग्रेड-1 में पदोन्नति मिली थी। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में वर्ष 2002 के उस कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया। इसके बाद मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने वरिष्ठता सूची में संशोधन करते हुए उन्हें दोबारा स्टेनोग्राफर ग्रेड-2 में भेज दिया।

इसके खिलाफ कर्मचारी ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने मुंबई पोर्ट अथॉरिटी को पदोन्नति का लाभ बहाल करने, बकाया वेतन देने और 30 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इसी आदेश की वैधता को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने आयोग की शक्तियों की सीमा स्पष्ट कर दी।

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