
रांची: झारखंड में नदियों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में खतरनाक कचरा डालना, नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकना या बाढ़ सुरक्षा ढांचे से छेड़छाड़ करना अब भारी पड़ सकता है। ऐसे मामलों में एक साल तक की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। इसके लिए जल संसाधन विभाग ने ‘द झारखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट-2026’ का प्रारूप तैयार किया है। विभाग ने मसौदे को सार्वजनिक करते हुए आम लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य बाढ़ के खतरे को कम करना और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाना है।
किन क्षेत्रों में लागू होगा नया कानून?
प्रस्तावित कानून के तहत राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर पूरे राज्य, नदी बेसिन, किसी नदी या उसके हिस्से, जिले अथवा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को बाढ़ क्षेत्र निर्धारण के दायरे में ला सकेगी। इसका दायरा झारखंड की सभी नदियों, सहायक नदियों, धाराओं, नालों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों तक होगा।
जल संसाधन विभाग के अनुसार, राज्य में बाढ़ और नदी कटाव से जनजीवन, संपत्ति, कृषि, बुनियादी ढांचे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, सीमांकन और वहां होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक व्यापक कानूनी व्यवस्था की जरूरत महसूस की गई। इसी उद्देश्य से यह मसौदा तैयार किया गया है।
राज्य और जिला स्तर पर बनेंगे प्राधिकरण
प्रस्तावित कानून के तहत जल संसाधन विभाग के सचिव या प्रधान सचिव की अध्यक्षता में राज्य बाढ़ क्षेत्र निर्धारण प्राधिकरण बनाया जाएगा। जिलों में उपायुक्त (डीसी), अन्य नामित अधिकारी या समिति जिला स्तर पर प्राधिकरण की भूमिका निभाएगी।
राज्य प्राधिकरण को केंद्रीय जल आयोग, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र, झारखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसी संस्थाओं से तकनीकी सहायता लेने का अधिकार होगा।
प्राधिकरण सर्वेक्षण और मानचित्रण करने, आपत्तियों का निपटारा करने, निर्माण संबंधी अनुमति देने या खारिज करने, निगरानी रखने और अतिक्रमण हटाने के निर्देश देने जैसे काम करेगा। आम लोगों को बाढ़ क्षेत्रों की जानकारी आसानी से मिल सके, इसके लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) आधारित पोर्टल बनाने का भी प्रस्ताव है।
तीन श्रेणियों में बांटे जाएंगे बाढ़ प्रभावित क्षेत्र
प्रस्तावित कानून में बाढ़ के जोखिम के आधार पर क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बांटने की व्यवस्था की गई है।
- संरक्षित क्षेत्र: इसमें नदी का मार्ग और वह क्षेत्र शामिल होगा, जो पांच साल में एक बार आने वाली बाढ़ से डूब सकता है। यहां स्थायी निर्माण, नदी के प्रवाह में बाधा, ठोस कचरे की डंपिंग, ज्वलनशील, विस्फोटक या विषैले पदार्थों का भंडारण और बड़े वाणिज्यिक एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। रेल और अन्य नागरिक बुनियादी ढांचे, तटबंध संरक्षण कार्य, पुल और घाट जैसी कुछ गतिविधियों को छूट मिल सकती है।
- विनियमित क्षेत्र: पांच से 25 वर्ष की पुनरावृत्ति अवधि वाली बाढ़ के दायरे में आने वाले क्षेत्रों को इस श्रेणी में रखा जाएगा। यहां आवासीय बस्तियों, महत्वपूर्ण रक्षा प्रतिष्ठानों और बेसमेंट से जुड़े निर्माण पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है। सार्वजनिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों जैसे कुछ निर्माण शर्तों के साथ किए जा सकेंगे। इनमें इमारत का न्यूनतम प्लिंथ स्तर 100 वर्ष की बाढ़ के स्तर से ऊपर रखना होगा।
- चेतावनी क्षेत्र: 25 से 100 वर्ष की पुनरावृत्ति अवधि वाली बाढ़ के दायरे में आने वाले क्षेत्र इस श्रेणी में होंगे। यहां खतरनाक अपशिष्ट पैदा करने वाले रासायनिक उद्योगों और परमाणु संयंत्रों पर रोक लगाने का प्रस्ताव है।
नदी किनारे 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक
मसौदे के अनुसार, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में 100 वर्ष में आने वाली बाढ़ के संभावित दायरे की पहचान करना जरूरी होगा। बाढ़ क्षेत्र के मानचित्रों की समीक्षा हर पांच साल में या बड़ी बाढ़ आने के बाद की जाएगी।
इसके अलावा नदी के किनारे से 100 मीटर के भीतर नया स्थायी निर्माण करने, जमीन की भराई करने या कचरा डालने पर सामान्यतः रोक रहेगी। हालांकि, सरकार जरूरत के अनुसार यह दूरी अलग निर्धारित कर सकेगी। आवश्यक सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों को निर्धारित शर्तों के साथ अनुमति देने का प्रावधान भी प्रस्तावित है।
नियम तोड़ने पर व्यक्ति और कंपनियों पर कितना जुर्माना?
प्रस्तावित कानून में उल्लंघन की गंभीरता और प्रकृति के आधार पर अलग-अलग दंड का प्रावधान रखा गया है।
- सामान्य उल्लंघन पर व्यक्ति को एक से दो लाख रुपये तक जुर्माना देना पड़ सकता है। उल्लंघन जारी रहने पर प्रतिदिन एक हजार से तीन हजार रुपये तक अतिरिक्त दंड का प्रस्ताव है।
- नदी में खतरनाक, जहरीला, जैव-चिकित्सकीय या औद्योगिक कचरा डालने अथवा नदी का प्रवाह बाधित करने पर एक साल तक की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
- कंपनियों के लिए पांच से 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। गंभीर मामलों में यह राशि 10 से 25 लाख रुपये तक हो सकती है।
- अवैध निर्माण या ढांचे को हटाने में आने वाला खर्च भी दोषी व्यक्ति या संस्था से वसूला जा सकेगा।
दंड के खिलाफ 60 दिन में कर सकेंगे अपील
मसौदे में दंड के खिलाफ अपील करने का प्रावधान भी रखा गया है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था प्राधिकरण के फैसले से प्रभावित होती है, तो वह दंड लगाए जाने के 60 दिनों के भीतर राज्य प्राधिकरण में अपील कर सकेगी।
फिलहाल यह कानून प्रारूप के स्तर पर है और जल संसाधन विभाग ने जनता से सुझाव मांगे हैं। अंतिम प्रावधान मसौदे पर विचार और आगे की प्रक्रिया के बाद तय होंगे।



