राष्ट्रपति के कूनो दौरे के बीच फिर गूंजी शेरों की मांग, 25 गांवों के विस्थापन का हवाला देकर शुरू हुआ आंदोलन

श्योपुर: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कूनो नेशनल पार्क दौरे के दौरान एशियाई शेरों के पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। श्योपुर में कूनो संघर्ष समिति ने धरना-प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपते हुए मांग की है कि कूनो को उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप एशियाई शेरों का दूसरा आवास बनाया जाए।
समिति का कहना है कि कूनो परियोजना की परिकल्पना ही एशियाई शेरों के पुनर्वास के लिए की गई थी। इसके लिए वर्षों पहले हजारों लोगों ने अपने गांव छोड़े और पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजरे। ऐसे में अब तक शेरों की बसावट नहीं होना स्थानीय लोगों के त्याग और परियोजना के मूल उद्देश्य के साथ न्याय नहीं माना जा सकता।
गांधी पार्क में धरना, राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन
रविवार को श्योपुर के गांधी पार्क में कूनो संघर्ष समिति के बैनर तले सत्याग्रह और धरना आयोजित किया गया। आंदोलन का नेतृत्व समिति के संयोजक एवं कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अतुल चौहान ने किया। बड़ी संख्या में शामिल लोगों ने जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भेजकर कूनो में एशियाई शेरों को बसाने की प्रक्रिया जल्द शुरू करने की मांग उठाई।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।
25 गांवों के 4545 परिवारों का हुआ था पुनर्वास
ज्ञापन में बताया गया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान के सर्वेक्षण के बाद वर्ष 1993-94 में कूनो क्षेत्र को एशियाई शेरों के पुनर्वास के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना गया था।
इसी योजना के तहत कूनो के आसपास बसे 25 गांवों के करीब 4545 परिवारों का पुनर्वास किया गया था। उद्देश्य यह था कि वन क्षेत्र को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त कर शेरों के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सके।
गिर में बढ़ती संख्या के बीच दूसरे आवास की जरूरत
कूनो संघर्ष समिति का तर्क है कि गुजरात के गिर वन क्षेत्र में एशियाई शेरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किसी प्राकृतिक आपदा, महामारी या अन्य बड़े संकट की स्थिति में पूरी प्रजाति के सामने खतरा खड़ा हो सकता है।
समिति का कहना है कि वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से शेरों के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित आवास विकसित करना बेहद आवश्यक है, ताकि प्रजाति का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी दिया हवाला
आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में वर्ष 2013 के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एशियाई शेरों को राष्ट्रीय धरोहर बताते हुए उन्हें कूनो में स्थानांतरित करने संबंधी निर्देश दिए थे।
समिति का कहना है कि इतने वर्षों बाद भी उस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है, जिससे स्थानीय लोगों में निराशा बढ़ी है।
चीता परियोजना और शेरों का पुनर्वास साथ-साथ संभव
कूनो संघर्ष समिति का मानना है कि वर्तमान में चल रही चीता परियोजना और एशियाई शेरों के पुनर्वास को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए।
आंदोलनकारियों का दावा है कि वैज्ञानिक योजना, प्रभावी प्रबंधन और पर्याप्त संसाधनों के साथ दोनों प्रजातियों का संरक्षण समानांतर रूप से किया जा सकता है। उनका कहना है कि इससे कूनो की वैश्विक पहचान और मजबूत होगी।
पर्यटन और रोजगार को मिलेगा नया अवसर
समिति के संयोजक अतुल चौहान ने कहा कि हजारों परिवारों ने शेर परियोजना के लिए अपना घर और गांव छोड़ा था। अब समय आ गया है कि कूनो को उसका वास्तविक उद्देश्य प्राप्त हो।
उन्होंने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप कर केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की। समिति का मानना है कि कूनो में एशियाई शेरों की बसावट होने से श्योपुर और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
इसके साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
राष्ट्रपति के दौरे के दौरान उठी इस मांग ने एक बार फिर कूनो में एशियाई शेरों के पुनर्वास को लेकर बहस तेज कर दी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी एजेंसियां इस मुद्दे पर आगे क्या कदम उठाती हैं।



