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अल-नीनो का असली असर अभी बाकी! अगले 5 महीने बढ़ा सकते हैं भारत की मुश्किलें, खेती से महंगाई तक पड़ सकता है असर

नई दिल्ली: देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 की शुरुआत भले ही हो चुकी है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की चिंता अभी खत्म नहीं हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल-नीनो का पूरा प्रभाव अभी दिखाई नहीं दिया है और जुलाई से नवंबर के बीच का समय भारत के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। मौसम विभाग के अनुमान भी सामान्य से कम बारिश की ओर इशारा कर रहे हैं, जिससे कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, इस वर्ष पूरे मॉनसून सीजन में वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। अनुमान है कि कुल बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (एलपीए) के लगभग 90 से 92 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। यदि ऐसा होता है तो देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?

अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इस बदलाव के कारण समुद्री हवाओं का सामान्य प्रवाह प्रभावित होता है और भारत की ओर आने वाली नमी युक्त हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यही वजह है कि अल-नीनो के दौरान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अक्सर कमजोर पड़ जाता है। चूंकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा मॉनसून से होती है, इसलिए इसका सीधा असर खेती, जल भंडारण, बिजली उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है।

जुलाई से सितंबर के बीच दिख सकता है बड़ा असर

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जून के दौरान अल-नीनो अपेक्षाकृत कमजोर रह सकता है, लेकिन जुलाई और अगस्त में इसके मध्यम स्तर तक पहुंचने तथा सितंबर तक और मजबूत होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वह अवधि है जब मॉनसून अपने चरम पर होता है और यदि अल-नीनो मजबूत हुआ तो बारिश में और गिरावट देखने को मिल सकती है।

मौसम एजेंसियों के आकलन के अनुसार, इस अवधि में अल-नीनो के विकसित होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत से अधिक बताई जा रही है।

पुराने रिकॉर्ड भी बढ़ाते हैं चिंता

पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश अल-नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम बारिश का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2009 में अपेक्षाकृत कमजोर अल-नीनो के बावजूद वर्षा केवल 78 प्रतिशत दर्ज की गई थी। वहीं 2015-16 के दौरान मजबूत अल-नीनो की स्थिति में कई क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बने थे।

हालांकि कुछ वर्षों में सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) ने अल-नीनो के असर को आंशिक रूप से कम किया था। फिलहाल 2026 में आईओडी तटस्थ स्थिति में है, लेकिन आगे इसके सकारात्मक होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है।

मॉनसून की शुरुआत रही कमजोर

जून 2026 के शुरुआती दो सप्ताह में देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से काफी कम दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में वर्षा की कमी 70 से 80 प्रतिशत तक बताई गई है। मध्य भारत और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में भी मॉनसून अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका है।

कम बारिश का असर खरीफ फसलों की बुवाई पर भी दिखाई देने लगा है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई से सितंबर के दौरान स्थिति और स्पष्ट होगी।

खेती और खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ सकता है असर

भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है और खरीफ सीजन की फसलें मॉनसून पर काफी हद तक आधारित होती हैं। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार कम वर्षा से प्रभावित हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसका असर खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ बाजार में कीमतों पर भी पड़ सकता है।

इन राज्यों पर ज्यादा असर की आशंका

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्षा आधारित खेती का दायरा अधिक है। ऐसे में इन राज्यों में कम बारिश का प्रभाव अपेक्षाकृत ज्यादा देखने को मिल सकता है।

जल संकट और बिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकते हैं

कम वर्षा की स्थिति में जलाशयों का जलस्तर घट सकता है, जिससे पेयजल और सिंचाई दोनों पर दबाव बढ़ेगा। औद्योगिक उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही जलविद्युत परियोजनाओं के उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है।

गर्मी और लू का खतरा बढ़ सकता है

अल-नीनो की स्थिति में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना होती है। इससे कई क्षेत्रों में गर्मी और लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं। बुजुर्गों, बच्चों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ सकते हैं।

महंगाई पर भी पड़ सकता है दबाव

यदि कृषि उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है। इससे महंगाई दर पर दबाव बढ़ सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे हालात में सरकार को अतिरिक्त राहत उपायों और आयात संबंधी फैसलों पर विचार करना पड़ सकता है।

सरकार ने शुरू की तैयारी

संभावित चुनौतियों को देखते हुए सरकार सूखा प्रबंधन और राहत योजनाओं की तैयारी में जुटी हुई है। कई जिलों में वैकल्पिक कृषि योजनाएं लागू की जा रही हैं और फसल बीमा योजनाओं को मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि मौसम की आगामी स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है।

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