संपादकीय फरवरी 2026

2027 का चुनावी बिगुल बज गया है और यूपी व उत्तराखंड की सरकारें पूरी तरह से चुनावी मोड में आ गई हैं। उत्तर भारत के इन दोनों प्रमुख राज्यों में करीब ग्यारह महीने बाद विधानसभा चुनाव होना है। यह रोचक तथ्य है कि दोनों राज्यों के मुखिया अपने-अपने सूबे में लगातार सबसे लंबे वक्त तक सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री हैं। उत्तराखंड और यूपी में बीजेपी ने लगातार दो चुनाव जीते हैं। ऐसे में दोनों सरकारों के लिए, 2027 का चुनाव जीत कर, नया इतिहास रचने का पूरा मौका है। इसलिए चुनौती ज्यादा गहरी है। पिछले चार सालों में यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने हिंदुत्व के साथ विकास का दामन नहीं छोड़ा है। दोनों राज्यों ने सुनिश्चित किया कि राज्य की जनता को केंद्रीय योजनाओं का पूरा फायदा मिले। औद्योगिक विकास, निवेश, रोजगार, सुशासन के मूलभूत मुद्दों पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने निजी रुचि ली।
पुष्कर सिंह धामी ने देश में सबसे पहले समान नागरिक संहिता लागू कर एक नया इतिहास रचा। नकल विरोधी कानून, भूमि सुधार, निवेश में ऐतिहासिक बढ़ोतरी जैसे कामों ने उन्हें सुर्खियों में रखा, जबकि यूपी के सीएम योगी ने राज्य को अपराधमुक्त करने के लिए बुलडोजर नीति को अन्य कई राज्यों के लिए अनुकरणीय बना दिया। जीडीपी में 18 फीसदी वृद्धि, बेरोजगारी दर में कमी, 80 नए मेडिकल कालेज, राज्य में नौ नए हवाई अड्डे और जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने यूपी में प्रगति की नई इबारत लिखी। धामी ने एक तरफ अवैध मदरसों और दरगाहों को जमींदोज़ किया, वहीं योगी ने लव जिहाद के ख़िलाफ़ मुहिम चला कर आक्रामक हिंदुत्व का कार्ड खेला। अब दोनों नेता अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता की अदालत में जाएंगे।
उधर दोनों राज्यों में बीजेपी के कोर वोटर रहे सवर्ण अचानक नाराज़ हो गए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यूजीसी के उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को रोकने के लिए जनवरी 2026 में आए नए नियमों पर रोक लग गई है। लेकिन अब सवर्ण वोट बैंक को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। कांग्रेस, सपा और बसपा इसे अपने हिसाब से भुना रही है। सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर स्टे लगाकर केवल छात्रों को नहीं बल्कि केंद्र सरकार को भी राहत दी है। अब सरकार के पास मौका है कि नियम के प्रावधानों में अस्पष्टताओं को दूर करते हुए छात्र हित में एक न्यायपूर्ण व समतामूलक नियमावली तैयार करे। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू हुए एक साल पूरा हो गया। अब तक इसके तहत पांच लाख से ज्यादा विवाह पंजीकरण हो चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इस पूरे अवधि में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया, जिसमें निजता का उल्लंघन हुआ हो। यह धामी सरकार की पारदर्शिता और कार्यशैली का ही असर है कि इस विवादित माने जाने वाले कानून को राज्य में लागू करने में कोई कठिनाई नहीं आई। उम्मीद है कि अब धीरे-धीरे अन्य राज्य भी इसे अपने राज्यों में लागू करेंगे।



