आधी रात का वो फैसला जिसने बदल दी थी भारतीय राजनीति, 21 महीने तक थम गई थी लोकतंत्र की रफ्तार

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे चर्चित और विवादास्पद अध्याय माने जाने वाले आपातकाल को गुरुवार को 51 वर्ष पूरे हो गए। 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया था, जो 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। करीब 21 महीने तक चले इस दौर ने भारतीय राजनीति, प्रशासन, न्याय व्यवस्था और मीडिया पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
उस समय राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा को मंजूरी दी थी। यह अवधि आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे अधिक बहस और राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुआ राजनीतिक संकट
आपातकाल की पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला अहम माना जाता है। वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जीत को चुनावी अनियमितताओं के आधार पर चुनौती दी गई थी।
यह याचिका विपक्षी नेता राजनारायण ने दायर की थी। सुनवाई के बाद अदालत ने इंदिरा गांधी को चुनावी नियमों के उल्लंघन का दोषी ठहराते हुए उनके निर्वाचन को निरस्त कर दिया था। इस फैसले के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शनों का दौर तेज हो गया, जिसने आगे चलकर आपातकाल की घोषणा का रास्ता तैयार किया।
आपातकाल लागू होते ही बदल गई देश की तस्वीर
आपातकाल की घोषणा के बाद देशभर में कई बड़े और व्यापक बदलाव देखने को मिले। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कई प्रकार की पाबंदियां लागू कर दी गईं।
चुनावों को स्थगित कर दिया गया और नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए, जबकि मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई। समाचार पत्रों और प्रकाशनों को खबरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति लेना अनिवार्य हो गया था।
विपक्षी नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां
आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं के खिलाफ व्यापक कार्रवाई की गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।
गिरफ्तारियों का दायरा इतना व्यापक था कि कई जेलों में क्षमता से अधिक बंदियों को रखा गया। इस दौरान प्रशासनिक सख्ती और पुलिस कार्रवाई को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आए।
आपातकाल को लेकर सामने आए कई अंदरूनी दावे
आपातकाल के वर्षों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री के निजी सचिव रहे आर.के. धवन ने एक साक्षात्कार में कई महत्वपूर्ण बातें साझा की थीं। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.एस. राय ने पहले ही आपातकाल लगाने की सलाह दी थी।
उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इस फैसले पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। इसके अलावा संजय गांधी की भूमिका और उस दौर में चलाए गए अभियानों को लेकर भी समय-समय पर कई चर्चाएं होती रही हैं।
1977 का चुनाव और सत्ता परिवर्तन
जनवरी 1977 में चुनाव कराने की घोषणा हुई और मार्च में आम चुनाव संपन्न हुए। चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति के लिए ऐतिहासिक साबित हुए। इंदिरा गांधी और कांग्रेस को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा, जबकि जनता पार्टी ने सत्ता हासिल कर केंद्र में सरकार बनाई।
इस चुनाव को भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक माना जाता है, जिसमें जनता ने मतदान के जरिए अपनी राय स्पष्ट रूप से सामने रखी।
क्यों आज भी चर्चा में रहता है आपातकाल?
आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का ‘काला अध्याय’ कहे जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध हैं। इस दौरान विपक्ष की गतिविधियों को सीमित किया गया, प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हुई और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण के आरोप लगे।
इसी वजह से 1975 से 1977 के बीच का यह दौर आज भी राजनीतिक विमर्श, संवैधानिक बहस और लोकतांत्रिक मूल्यों पर चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। 51 वर्ष बाद भी आपातकाल भारतीय राजनीति के उन अध्यायों में शामिल है, जिनका उल्लेख लोकतंत्र, अधिकारों और शासन व्यवस्था पर होने वाली हर बड़ी बहस में किया जाता है।



