ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में संत परंपरा की अमूल्य विरासत ‘मेरे नामदेव-भक्तमाल कथा’ का दिव्य एवं भव्य आयोजन हुआ। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य, प्रेरणामयी उपस्थिति, आशीर्वचन एवं उद्बोधन सभी श्रद्धालुओं के लिये आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम स्रोत बना।
अमृतमयी कथाओं का ऐसा रसपान करा रहे
कथा के दिव्य वक्ता गौवत्स श्री राधाकृष्ण महाराज ने अपने श्रीमुख से भक्तमाल की अमृतमयी कथाओं का ऐसा रसपान करा रहे हैं कि श्रोतागण भक्ति, प्रेम और समर्पण के अद्भुत संसार में प्रवेश कर रहे हैं। भक्तमाल कथा पूज्य संतों के तप, त्याग, प्रेम और परमात्मा के प्रति अटूट समर्पण की जीवंत अनुभूति है। भक्तमाल कथा का प्रत्येक प्रसंग मानो श्रद्धा के सुप्त बीजों को जागृत कर रहा है।

भक्तमाल कथा पूज्य संतों के जीवन का प्रकाशस्तंभ
भक्तमाल कथा पूज्य संतों के जीवन का ऐसा प्रकाशस्तंभ है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, अहंकार से समर्पण की ओर और अशांति से आनंद की ओर ले जाती है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि संतों का जीवन मानवता के लिये ईश्वर का खुला संदेश है। उन्होंने कहा कि भक्तमाल की कथाएँ हमें संदेश देती हैं कि सच्ची भक्ति हृदय की निर्मलता, सेवा की भावना और परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास में निहित है। आज जब संसार तनाव, विभाजन और भौतिकता की दौड़ में उलझा हुआ है, तब पूज्य संतों की जीवनगाथाएं मानवता को प्रेम, करुणा और एकता का मार्ग दिखाती हैं।

सम्पूर्ण समाज के कल्याण को अपना जीवन लक्ष्य बनाया
उन्होंने कहा कि पूज्य संतों ने अपना जीवन केवल अपने लिये नहीं जिया, बल्कि उन्होंने सम्पूर्ण समाज के कल्याण को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर यदि हम अपने भीतर सेवा, सद्भाव और संवेदनशीलता के भाव विकसित करें तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः संभव हो सकता है। पूज्य स्वामी ने कहा कि भारतीय संत परंपरा के ऐसे तेजस्वी नक्षत्र हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि भगवान को न विद्वत्ता चाहिए, न वैभव, न बाहरी आडंबर, उन्हें केवल निष्कलुष प्रेम चाहिए। संत नामदेव का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब भक्त का हृदय पूर्ण समर्पण से भर जाता है, तब भगवान स्वयं उसके प्रेम के अधीन हो जाते हैं।



