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पेपर लीक केस में हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी! ‘प्राइवेट पार्ट’ और ‘एग्जाम पेपर’ में फर्क समझिए, पुलिस की धाराएं हुईं खारिज

नई दिल्ली: गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात लोक सेवा आयोग (जीपीएससी) परीक्षा से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पुलिस की ओर से लगाए गए प्राइवेसी उल्लंघन के आरोपों को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रश्नपत्र की तस्वीर खींचकर उसे किसी अन्य व्यक्ति को भेजना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की उस धारा के दायरे में नहीं आता, जो किसी व्यक्ति की निजी तस्वीरों के दुरुपयोग से संबंधित है। कोर्ट ने इस दौरान कानून की व्याख्या करते हुए पुलिस को भी महत्वपूर्ण नसीहत दी।

यह आदेश जस्टिस पी. एम. रावल की एकल पीठ ने 16 जून को सुनाया। मामला वर्ष 2018 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें हार्दिक पुरोहित और राहुल पुरोहित नामक दो भाइयों को आरोपी बनाया गया था। दोनों ने अपने खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।

क्या था पूरा मामला?

एफआईआर के अनुसार, जीपीएससी परीक्षा के दौरान हार्दिक पुरोहित कथित तौर पर मोबाइल फोन परीक्षा केंद्र के भीतर ले गया और प्रश्नपत्र की तस्वीर खींच ली। आरोप है कि उसने यह तस्वीरें व्हाट्सऐप के माध्यम से अपने भाई राहुल पुरोहित को भेज दीं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दोनों भाइयों के खिलाफ आपराधिक साजिश, सरकारी आदेश की अवहेलना और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66-ई के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

आईटी एक्ट की धारा 66-ई पर कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66-ई के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसके निजी अंगों या निजी क्षेत्र की तस्वीर लेने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने जैसे मामलों के लिए बनाया गया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रश्नपत्र की तस्वीर लेकर उसे व्हाट्सऐप पर भेजना किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसलिए इस मामले में धारा 66-ई लागू करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने यह आरोप रद्द कर दिया।

सरकारी आदेश की अवहेलना वाली धारा भी हटाई

पुलिस ने आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 भी लगाई थी। पुलिस का तर्क था कि परीक्षा केंद्र में मोबाइल फोन ले जाना प्रतिबंधित था और आरोपी ने नियमों का उल्लंघन किया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की ओर से जारी निर्देशों को किसी लोक सेवक के कानूनी आदेश के समान नहीं माना जा सकता। परीक्षा नियमों का उल्लंघन और सरकारी आदेश की अवहेलना दो अलग-अलग बातें हैं। इसी वजह से अदालत ने धारा 188 को भी निरस्त कर दिया।

राहत मिली, लेकिन मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं

हाईकोर्ट ने भले ही आईटी एक्ट की धारा 66-ई और आईपीसी की धारा 188 को खारिज कर दिया हो, लेकिन आरोपियों को पूरी तरह राहत नहीं मिली है। अदालत ने साफ कहा है कि जांच एजेंसी अन्य संभावित अपराधों के संबंध में अपनी जांच जारी रख सकती है।

यदि जांच अधिकारी को लगता है कि मामले में परीक्षा संबंधी अनियमितता, धोखाधड़ी या किसी अन्य अपराध के पर्याप्त आधार मौजूद हैं, तो संबंधित कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में केस की जांच अन्य पहलुओं पर आगे बढ़ने का रास्ता खुला हुआ है।

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