मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म परिवर्तन करते ही नहीं मिलेगा पिछड़े मुस्लिम वर्ग का लाभ, सरकार का आदेश रद्द

नई दिल्ली: धर्म परिवर्तन और आरक्षण व्यवस्था से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने से कोई व्यक्ति स्वतः पिछड़े मुस्लिम वर्ग (बीसी-मुस्लिम) का सदस्य नहीं बन जाता। इसी के साथ अदालत ने तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2024 के उस सरकारी आदेश को भी असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वालों को बीसी (मुस्लिम) श्रेणी का लाभ देने का प्रावधान किया गया था।
हिंदू से मुस्लिम बने व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई
मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने वर्ष 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया था और अपना नाम भी बदल लिया था। इसके बाद उसने खुद को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय का सदस्य बताते हुए सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की थी।
हालांकि तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने इस फैसले को चुनौती देते हुए मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
सरकार ने रखा यह तर्क
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने अदालत को बताया कि वर्ष 2024 के सरकारी आदेश के तहत वे लोग, जो पहले से पिछड़ा वर्ग (बीसी), अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी), विमुक्त समुदाय (डीएनसी) या अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणियों के तहत आरक्षण का लाभ ले रहे थे, इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी बीसी (मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण पाने के पात्र रहेंगे।
सरकार का तर्क था कि इससे सामाजिक संतुलन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और धर्म परिवर्तन करने वालों को भी आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा।
हाईकोर्ट ने खारिज की सरकार की दलील
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि वर्ष 1951 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल मुस्लिम माना जाएगा। उसका सामाजिक दर्जा उस जाति के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता, जिससे वह धर्म परिवर्तन से पहले जुड़ा था।
अदालत ने यह भी कहा कि इस कानूनी सिद्धांत को बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी स्वीकार किया जा चुका है।
इस्लाम में समानता के सिद्धांत का हवाला
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि इस्लाम समानता और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। ऐसे में केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को रौथर, मरक्कायर, लेब्बई या देक्कनी जैसे विशेष मुस्लिम समुदायों का सदस्य नहीं माना जा सकता।
अदालत के अनुसार, ये समुदाय जन्म आधारित सामाजिक पहचान से जुड़े होते हैं और केवल धर्म बदल लेने से किसी व्यक्ति को इन समुदायों में शामिल नहीं किया जा सकता।
सरकारी आदेश से नहीं बदले जा सकते न्यायिक फैसले
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि संविधान में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत एक मूलभूत आधार है। सरकार किसी न्यायालय के अंतिम निर्णय को केवल कार्यपालिका के आदेश के जरिए निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि सरकार ने बीसी, एमबीसी, डीएनसी और एससी जैसी अलग-अलग संवैधानिक श्रेणियों से आने वाले धर्मांतरित लोगों को एक ही श्रेणी में रखकर आरक्षण देने की कोशिश की, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग अलग-अलग संवैधानिक वर्गीकरण हैं।
2024 का सरकारी आदेश असंवैधानिक घोषित
सभी कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विचार करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2024 के सरकारी आदेश को संविधान के विपरीत करार देते हुए रद्द कर दिया। साथ ही संबंधित याचिका का भी निपटारा कर दिया गया।यह फैसला धर्म परिवर्तन, सामाजिक पहचान और आरक्षण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।



