सिंधु जल संधि पर नया मोर्चा! पाकिस्तान का ‘जल संकट’ नैरेटिव कितना सच, कितना रणनीति का हिस्सा?

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हालिया घटनाक्रमों के बाद यह मुद्दा केवल नदी के पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय जनमत और रणनीतिक संदेश की लड़ाई का रूप लेता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान लगातार यह दावा कर रहा है कि भारत के कदमों की वजह से उसे गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ रहा है, जबकि विशेषज्ञ इस दावे को अलग नजरिए से देख रहे हैं।
पानी नहीं, वैश्विक धारणा की लड़ाई भी अहम
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार युद्ध और संघर्ष केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि वैश्विक मंचों पर भी लड़े जाते हैं। किसी देश को पीड़ित और दूसरे को जिम्मेदार साबित करना कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की हालिया सक्रियता को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।
पाकिस्तान के वरिष्ठ नेताओं ने हाल के दिनों में जल सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कई तीखे बयान दिए हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यहां तक कहा कि यदि देश की जल सुरक्षा को खतरा हुआ तो भारत के खिलाफ युद्ध भी एक विकल्प हो सकता है। ऐसे बयानों ने इस विवाद को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद तेज हुआ विवाद
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की सैन्य कार्रवाई और उसके बाद सिंधु जल संधि के कुछ प्रावधानों को प्रभावी रूप से स्थगित करने के फैसले ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दिया। भारत ने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा था कि “खून और पानी साथ नहीं बह सकते।”
इसके बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाना शुरू किया कि भारत उसके हिस्से का पानी रोक रहा है। सिंध और बलूचिस्तान में पानी की कमी, कृषि पर असर और जल संकट को भारत के फैसलों से जोड़कर पेश किया जाने लगा। धीरे-धीरे यह विषय अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों में भी जगह बनाने लगा।
क्या वास्तव में भारत ने पानी रोक दिया है?
जल विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने पाकिस्तान को मिलने वाला पानी पूरी तरह रोक दिया है। सिंधु नदी प्रणाली का अधिकांश जल अब भी पाकिस्तान की ओर प्रवाहित हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के पास फिलहाल इतनी भंडारण क्षमता और बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है कि वह सिंधु प्रणाली के पूरे जल प्रवाह को रोक सके। इसलिए पाकिस्तान के कुछ दावों को तकनीकी दृष्टि से अतिरंजित माना जा रहा है।
भारत ने किन व्यवस्थाओं में बदलाव किया है?
भारत ने संधि के तहत दोनों देशों के बीच होने वाले संस्थागत सहयोग, तकनीकी जानकारी के आदान-प्रदान और जल प्रबंधन से जुड़े समन्वय को पहले की तरह जारी नहीं रखा है। पहले नदी प्रवाह, बांध परियोजनाओं और अन्य तकनीकी जानकारियों को साझा किया जाता था, लेकिन अब इन प्रक्रियाओं में बदलाव आया है।
हालांकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह जारी है, लेकिन सहयोग और समन्वय की व्यवस्थाओं में आई कमी को पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़ा मुद्दा बनाकर पेश कर रहा है।
पाकिस्तान के जल संकट के पीछे अन्य कारण भी
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान में पानी की कमी के लिए केवल भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दक्षिण एशिया में बदलते मौसम चक्र, अल-नीनो प्रभाव, कम वर्षा, ग्लेशियरों के पिघलने की गति में बदलाव और हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी के पैटर्न में परिवर्तन जैसे कई प्राकृतिक कारक भी जल उपलब्धता को प्रभावित कर रहे हैं।
इन परिस्थितियों के कारण नदियों और नहरों में जल स्तर का घटना एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। इसके बावजूद पाकिस्तान इस स्थिति को भारत के फैसलों से जोड़कर प्रस्तुत कर रहा है।
घरेलू राजनीति से भी जुड़ा है मुद्दा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान में जल संकट का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी उपयोगी साबित हो सकता है। बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति और लगातार हो रही आतंकी घटनाओं के बीच बाहरी खतरे का नैरेटिव सरकार के लिए फायदेमंद माना जाता है।
यही कारण है कि पाकिस्तान के कई नेता सिंधु जल विवाद को केवल संसाधन प्रबंधन का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व और सुरक्षा से जुड़ा मामला बताकर पेश कर रहे हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सैन्य स्तर पर भारत के लिए कोई तात्कालिक खतरा नहीं दिखता, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर घेरने में सफलता हासिल की है।
अब पाकिस्तान जल संकट को अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाकर वैश्विक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह धारणा बनती है कि पाकिस्तान में पानी की कमी के लिए भारत जिम्मेदार है, तो भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को कानूनी और रणनीतिक पहलुओं के साथ-साथ सूचना और कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय रहना होगा, ताकि सिंधु जल संधि से जुड़े तथ्यों और अपनी स्थिति को प्रभावी ढंग से वैश्विक मंचों पर रखा जा सके।



