
बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की अलग-अलग राय, अब तीसरे जज की बेंच करेगी अंतिम फैसला
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई की वैधता से जुड़े एक अहम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ एकमत नहीं हो सकी है। हमीरपुर मामले की सुनवाई के दौरान दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग आने के बाद अब विवादित कानूनी मुद्दों पर फैसला तीसरे न्यायाधीश की बेंच करेगी। माना जा रहा है कि इस मामले का निर्णय प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामलों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
खंडपीठ में शामिल न्यायमूर्ति अतुल श्रीवास्तव ने अपने मत में कहा कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के आधार पर उसके मकान को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि सामान्य परिस्थितियों में एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। हालांकि, सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के मामलों को उन्होंने अपवाद माना है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीवास्तव ने दिए ये सुझाव
न्यायमूर्ति अतुल श्रीवास्तव की राय के अनुसार, यदि कोई कथित अवैध निर्माण तीन वर्ष या उससे अधिक पुराना है तो उस पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू करने से पहले संबंधित व्यक्ति को एक वर्ष का नोटिस दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नगरपालिका कानूनों के उल्लंघन की आड़ में किसी आपराधिक मामले के आरोपी के घर को जल्दबाजी में गिराना कार्यपालिका की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई माना जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावित व्यक्ति के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा हमेशा खुला रहता है और वह न्यायिक राहत प्राप्त कर सकता है।
इन सुझावों से असहमत रहे न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन
खंडपीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इन प्रस्तावित दिशानिर्देशों से असहमति जताई। उनका कहना था कि अदालत इस प्रकार का निश्चित समय निर्धारित नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने से कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और ऐसे मामलों में एक समान समयसीमा लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।
अब तीसरे जज तय करेंगे कानूनी सवालों का जवाब
दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद सामने आने के बाद मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है, ताकि तीसरे न्यायाधीश की बेंच इन कानूनी प्रश्नों पर अपना निर्णय दे सके।
तीसरे न्यायाधीश के समक्ष मुख्य रूप से यह सवाल रहेगा कि क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 के तहत दो वर्ष तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से रोकने संबंधी निर्देश जारी कर सकता है। इसके अलावा यह भी तय किया जाएगा कि क्या नगर निकाय कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले अधिकारियों को एक वर्ष पूर्व नोटिस देने का निर्देश दिया जा सकता है।
पहले भी सरकार को लगा चुकी है फटकार
गौरतलब है कि इसी वर्ष फरवरी में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उस समय फटकार लगाई थी, जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई जारी रखने का मामला अदालत के सामने आया था। उस दौरान हाईकोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए थे।



