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देवशयनी एकादशी 2026: कल से शुरू होगा चातुर्मास, जानिए विष्णु पूजन का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत पारण का सही समय

नई दिल्ली: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाई जाने वाली देवशयनी एकादशी इस वर्ष 25 जुलाई को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चार महीने तक चलने वाले चातुर्मास का आरंभ होता है। इस अवधि का समापन 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन होगा, जब भगवान विष्णु पुनः योगनिद्रा से जागेंगे। सनातन परंपरा में देवशयनी एकादशी का व्रत, पूजा और दान-पुण्य अत्यंत फलदायी माना जाता है।

देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बावजूद इस दिन व्रत और पूजा का महत्व कम नहीं होता। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से श्रीहरि की उपासना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

पूजा के लिए शुभ मुहूर्त

देवशयनी एकादशी पर प्रातःकाल पूजा का सर्वोत्तम समय सुबह 4 बजकर 17 मिनट से सुबह 6 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा दोपहर का अभिजीत मुहूर्त 12:00 बजे से 12:55 बजे तक पूजा के लिए शुभ माना गया है। संध्या आराधना के लिए शाम 7 बजकर 17 मिनट से रात 8 बजकर 19 मिनट तक का समय अनुकूल रहेगा।

ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा

एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराएं तथा पीले पुष्प, चंदन, रोली, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले फल और सात्विक भोग लगाएं। भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें, एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें और अंत में धूप-दीप से आरती करें।

कब करें व्रत का पारण

देवशयनी एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि यानी 26 जुलाई को खोला जाएगा। पारण का शुभ समय सुबह 5 बजकर 39 मिनट से सुबह 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इस दिन द्वादशी तिथि का समापन दोपहर 1 बजकर 57 मिनट पर होगा।

चातुर्मास की होगी शुरुआत

देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ हो जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इस अवधि में व्रत, जप, तप, दान, भजन-कीर्तन और धार्मिक साधना का विशेष महत्व माना जाता है।

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