उत्तर प्रदेशराज्यलखीमपुर खेरी

पेड़ चाहे इंसान काटे या खुद गिरे, नुकसान हर हाल में इंसान का ही होगा

प्रकृति की क्षति में इंसान का लाभ सीमित परंतु हानियां असीमित

अहंकार विनाशकारी है, क्योंकि प्रकृति में
हर स्तर का उच्च स्तर विद्यमान है।
हारने वाला हारकर भी जीतने वाले इंसान में
जीत के अहं का दोष भर जाता है।

रमेश कुमार

लखीमपुर : एक कहावत अत्यंत विख्यात है। चाकू कद्दू पर गिरे या कद्दू चाकू पर पर कटता हर हाल में कद्दू ही है। यह बात जितना साधारण प्रतीत होती है, वास्तव में उतनी साधारण है नहीं। सामान्य तौर पर हम सोचते कि इसमें विशेष क्या है? इसे थोड़ा विस्तृत ढंग से समझते हैं। जब चाकू कद्दू को काटेगा तो तो उसको उसकी तेजस्विता का अभिमान होने के कारण निसंदेह उसकी प्रवृति हिंसक, उन्मादी, अहंकारी एवं आक्रामक की होगी वहीं उस समय कद्दू को अपनी कमजोरी ज्ञात होने के कारण उसकी प्रवृति असहाय, कमजोर, निरीह एवं रक्षात्मक की होगी। वहीं जब कद्दू चाकू को काटने का प्रयत्न करेगा, तो वह अज्ञानता, उकसावा, बहकावा एवं मूढंता के कारण इस प्रकार की प्रवृत्ति को धारित करेगा, वहीं उस समय चाकू की प्रवृत्ति व्यंगात्मक, कठोर, निर्भीकता की होगी। परंतु जब इस प्रकार की प्रवृत्ति का अनावृत्ति अर्थात बारंबारता होने लग जाए तो निसंदेह चाकू अति उन्मादी, अति अहंकारी एवं अति हिंसक प्रवृत्ति को जाएगा। अब ऐसा चाकू जो अपने मद में चूर है, अपने अहंकार में चूर है, उसका मुकाबला यदि ऐसे समय में तलवार से हो जाए तो चाकू के मन को समझा पाना, उसे रोक पाना अति दुष्कर कार्य होगा, परंतु यह भी स्पष्ट है कि चाकू और तलवार का कोई सामना नहीं है, वह टिक ही नहीं सकता।

यदि अपने उन्माद, अज्ञानता के कारण सामना करने का प्रयत्न करेगा तो बेशक चह तेजस्वी है, परंतु तलवार से पार नहीं पा सकता और लड़ने पर अपनी दुर्गति करा लेगा। ऐसी प्रवृति इंसानों में भी होती है, एक ऐसा इंसान जो शरीर, पैसा, प्रतिष्ठा, पद से बेहतर हो सकता है, पर यदि उसका उसे अभिमान हो जाए तो उसके अंदर निरंकुशता, आत्ममुग्धता, अमानवीय प्रवृत्तियॉ का होने लगता है और ऐसा करते समय वह भूल जाता है तलवार की भॉति उससे भी ऊपर उच्च पदस्थ, बलिष्ठ, प्रतिष्ठित लोग विद्यमान हैं। मदमस्त होने के चलते उनसे टकराते ही चाकू और कद्दू जैसी स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसी के समानांतरीय उदाहरण हमारी प्रकृति भी प्रस्तुत करती है। पेड़ को चाहे इंसान काटे, अथवा वह अन्य कारणों से स्वयं सूख जाए अथवा टूट जाए दोनों स्थितियों में ही क्षति इंसान को ही होती है।

पेड़ को इंसान द्वारा काटे जाने की स्थिति में एक ओर जहां इंसान में हिंसात्मक प्रवृत्ति का सूत्रपात होगा, वहीं उसे पेड़ से फल, फूल, पत्ती, छाया एवं उच्च बायोमास के रुप में मिलने वाले लाभों से वह वंचित हो जाएगा। वहीं यदि पेड़ स्वयं अथवा अन्य परिस्थितिजन्य स्थितियों के चलते स्वमेव सूखता एवं टूटता है, ऐसी स्थिति में हिंसात्मक प्रवृत्ति के व्युत्पन्न होने की स्थिति से तो बच जाएगा, परंतु वह उसको फल, फूल, पत्ती, छाया एवं उच्च बायोमास के रुप में मिलने वाले लाभों से फिर भी वंचित रहना पड़ेगा। तदनुसार स्पष्ट है कि प्रकृति के नुकसान में इंसान का लाभ सीमित हैं, परंतु हानियां असीमित हैं। वृक्ष न केवल हमारे जीवन के लिए बहु उपयोगी जीवन रक्षक शुद्ध वायु प्रदान करने में सहायक हैं, अपितु पर्यावरण में वायु प्रदूषण के उत्तरदायी पार्टिकुलर मैटर को भी नियंत्रित करने का कार्य करते हैं।

(लेखक दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग, पलिया-खीरी से संबद्ध हैं।)

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