स्तम्भ

ट्रंप का ईरान से ‘सीक्रेट कनेक्शन’, इराकी नेता ने ऐसे बनाया IRGC तक सीधा रास्ता, जानिए पूरी कहानी

वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच मई में हुई बातचीत को लेकर एक अहम दावा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना थी कि तेहरान में वास्तविक फैसले लेने की शक्ति किसके पास है। इसी को समझने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवन बरजानी के जरिए ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC तक एक गुप्त बैकचैनल बनाने की कोशिश की।

क्यों बरजानी को चुना गया?

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और IRGC दोनों के साथ बरजानी के पुराने संपर्कों को देखते हुए उन्हें इस संवेदनशील काम के लिए चुना गया। कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट उत्तरी इराक के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र का प्रशासन संभालती है और इसका मुख्यालय एरबिल में है।

बरजानी के ईरान से पुराने संबंध बताए जाते हैं। ईरान-इराक युद्ध के दौरान वह ईरान में रहे और तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। वह फारसी भाषा बोलते हैं और ईरानी शासन के कई वरिष्ठ अधिकारियों तथा IRGC के शीर्ष सदस्यों से उनके व्यक्तिगत संपर्क बताए जाते हैं। क्षेत्रीय राजनीति में उन्हें व्यावहारिक और बातचीत के जरिए समाधान निकालने वाले नेता के तौर पर भी देखा जाता है।

अमेरिका ने बरजानी से कैसे साधा संपर्क?

रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 10 मई को तत्कालीन नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने बरजानी से संपर्क किया। उनसे IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी तक पहुंच बनाने में मदद मांगी गई। एक सूत्र के अनुसार, गबार्ड ने बताया कि वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मंजूरी के बाद यह संपर्क कर रही थीं।

अमेरिका यह जानना चाहता था कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को IRGC नेतृत्व का समर्थन हासिल है या नहीं। साथ ही वॉशिंगटन यह भी समझना चाहता था कि ईरानी सेना की कोई अलग मांग या रणनीति तो नहीं है।

बरजानी ने अमेरिकी अनुरोध स्वीकार कर अपने ईरानी संपर्कों के जरिए संदेश पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने जनरल वाहिदी से सीधे बात करने की इच्छा जताई, जिसे तेहरान की ओर से मंजूरी मिल गई।

14 मई को हुई फोन पर बातचीत

रिपोर्ट के अनुसार, 14 मई को IRGC के एक अधिकारी ने एरबिल में बरजानी से मुलाकात की और उन्हें सुरक्षित बातचीत के लिए एक एन्क्रिप्टेड फोन दिया। इसी फोन के जरिए बरजानी ने जनरल वाहिदी से संपर्क किया।

बताया जाता है कि बरजानी ने उनसे पूछा कि क्या वह ईरानी वार्ताकारों के साथ हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वाहिदी ने सकारात्मक जवाब देते हुए वार्ताकारों को अपना पूरा समर्थन बताया और कहा कि यह IRGC की भी राय है। उन्होंने संकट का समाधान बातचीत के जरिए निकालने का संकेत भी दिया।

इसके बाद बरजानी ने यह संदेश गबार्ड तक पहुंचाया और गबार्ड ने इसे वाइट हाउस तक पहुंचाया।

अमेरिका-ईरान की गुप्त बैठक का भी था प्रस्ताव

ईरान की ओर से सकारात्मक संकेत मिलने के बाद ट्रंप प्रशासन ने बरजानी से दोबारा संपर्क किया। इस बार प्रस्ताव एरबिल में अमेरिका और ईरान के वरिष्ठ वार्ताकारों के बीच एक गुप्त बैठक कराने का था।

हालांकि, ईरानी पक्ष की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के चलते यह बैठक नहीं हो सकी। इसके बावजूद बरजानी के जरिए IRGC नेतृत्व तक पहुंच बनाने की अमेरिकी कोशिश को दोनों देशों के बीच बातचीत के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है।

अमेरिका के लिए क्यों अहम था IRGC तक पहुंचना?

मई में हुई इस कवायद से यह पता चलता है कि वॉशिंगटन के लिए ईरान के साथ बातचीत करना कितना जटिल था। अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता था कि ईरान की ओर से बातचीत करने वाले अधिकारी देश के सभी प्रभावशाली शक्ति केंद्रों की सहमति से आगे बढ़ रहे हैं या नहीं।

इसी वजह से अमेरिकी प्रशासन के लिए IRGC का रुख समझना महत्वपूर्ण था। बातचीत के दौरान यह भी स्पष्ट करना जरूरी था कि सैन्य नेतृत्व की अपनी कोई अलग मांग या रणनीति तो नहीं है।

समझौते के बाद भी क्यों नहीं बनी बात?

रिपोर्ट के अनुसार, मई में अमेरिका और ईरान एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग तक पहुंचने में सफल हुए थे। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच शर्तों और शब्दों को लेकर मतभेद सामने आने के बाद यह समझ कमजोर पड़ गई।

इस बीच पाकिस्तान और कतर के मध्यस्थ वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। हालांकि, अब तक बातचीत में कोई बड़ी प्रगति नहीं हुई है।

आगे ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान में उन प्रभावशाली लोगों तक सीधे पहुंच बनाने की होगी, जिनके पास वास्तव में फैसले लेने की शक्ति है। ऐसे में बरजानी जैसे मध्यस्थों की भूमिका अहम हो सकती है, जिन पर अमेरिका और ईरान दोनों पक्ष भरोसा करते हों। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कुछ सूत्र इस्लामाबाद की ओर से बातचीत की स्थिति को लेकर पेश किए जा रहे आकलन को जरूरत से ज्यादा आशावादी मानते हैं।

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