विकास की सड़कें दिखाई देती हैं, औद्योगिक निवेश दिखाई देता है, पर्यटन की संभावनाएं दिखाई देती हैं लेकिन इन सबके पीछे ऊर्जा की वह अदृश्य शक्ति होती है जो पूरी अर्थव्यवस्था को चलाती है। धामी सरकार का यह निर्णय उसी अदृश्य शक्ति को अगले 25 वर्षों के लिए अधिक सुरक्षित और स्थिर करने की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है।
देहरादून: उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और तेजी से विकसित होते राज्य के लिए बिजली महज एक बुनियादी सुविधा नहीं, बल्कि विकास की पहली शर्त है। उद्योग हो, पर्यटन हो, शहरों का विस्तार हो, ग्रामीण अर्थव्यवस्था हो या डिजिटल सेवाओं का विस्तार। हर क्षेत्र की रफ्तार विश्वसनीय और पर्याप्त बिजली आपूर्ति से तय होती है। ऐसे में धामी कैबिनेट का 1320 मेगावाट बिजली की दीर्घकालिक खरीद की दिशा में आगे बढ़ना एक सामान्य सरकारी निर्णय के बजाय आने वाले 25 वर्षों की ऊर्जा सुरक्षा का रोडमैप दिखाई देता है।
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धामी सरकार की ‘दीर्घकालिक सोच’ है। उत्तराखंड की बिजली व्यवस्था लंबे समय से जलविद्युत पर मजबूत निर्भरता के साथ आगे बढ़ती रही है। जलविद्युत राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक ताकत है, लेकिन मौसम और जल उपलब्धता में बदलाव के कारण केवल इसी स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में चुनौती बन सकती है। प्रस्तावित 1320 मेगावाट की दीर्घकालिक खरीद इसी जोखिम को संतुलित करने का प्रयास है। यानी राज्य अपनी ऊर्जा व्यवस्था में एक ऐसा आधार तैयार कर रहा है, जो मौसम के उतार-चढ़ाव के बीच बिजली की उपलब्धता को अधिक स्थिर बना सके। यहीं से इस फैसले का विकास से सीधा संबंध बनता है।

किसी भी निवेशक के लिए सड़क, जमीन और कानून-व्यवस्था जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण यह गारंटी भी है कि उसके उद्योग को आने वाले वर्षों में भरोसेमंद बिजली मिलेगी। यदि बिजली की उपलब्धता अनिश्चित हो, तो बड़े उद्योग, डेटा सेंटर, पर्यटन परियोजनाएं, होटल, अस्पताल और आधुनिक सेवा क्षेत्र दीर्घकालिक निवेश का जोखिम उठाने में हिचकेंगे। इसके विपरीत यदि राज्य यह भरोसा दे सके कि ऊर्जा की उपलब्धता दीर्घकाल तक सुनिश्चित है, तो निवेश के लिए वातावरण स्वतः अधिक अनुकूल होता है।
आज का धामी कैबिनेट का यह फ़ैसला भी इसी दिशा की ओर संकेत करता है। जिसमें प्रस्तावित बिजली खरीद से लक्षित औद्योगिक, वाणिज्यिक और पर्यटन विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित होने की बात कही गई है।
इस निर्णय की दूसरी बड़ी उपलब्धि कीमत को लेकर है। प्रतिस्पर्धी टैरिफ आधारित बोली में ₹5.746 प्रति यूनिट की न्यूनतम दर प्राप्त हुई है और प्रेस नोट के अनुसार यह अन्य राज्यों में आमंत्रित समान निविदाओं की तुलना में कम है।
इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बिजली बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव राज्य के वित्तीय प्रबंधन और उपभोक्ताओं दोनों को प्रभावित कर सकता है। दीर्घकालीन खरीद व्यवस्था से बिजली खरीद की लागत में अपेक्षाकृत स्थिरता आने की उम्मीद है। इससे राज्य को महंगे अल्पकालिक बाजार पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी और उपभोक्ताओं के लिए बिजली की उपलब्धता अधिक पूर्वानुमेय हो सकेगी।
यानी यह फैसला सिर्फ ‘बिजली खरीदने’ का फैसला नहीं है,यह बिजली की कीमत और उपलब्धता में अनिश्चितता घटाने का एक बेहतर कदम है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है। 24 घंटे गुणवत्तापूर्ण बिजली की उपलब्धता की दिशा में बड़ा कदम। आज के दौर में विकास का अर्थ केवल बिजली का कनेक्शन उपलब्ध होना नहीं है। उद्योग को निर्बाध आपूर्ति चाहिए, अस्पतालों को निरंतर बिजली चाहिए, पर्यटन प्रतिष्ठानों को भरोसेमंद ऊर्जा चाहिए और डिजिटल अर्थव्यवस्था को चौबीसों घंटे बिजली चाहिए। इसलिए 24×7 गुणवत्तापूर्ण बिजली की उपलब्धता को विकास के बुनियादी ढांचे का हिस्सा मानना होगा।
उत्तराखंड के संदर्भ में इसका एक और बड़ा लाभ है।इससे ऊर्जा एक्सचेंजों पर निर्भरता में कमी आएगी। जब किसी राज्य को अपनी तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए बार-बार खुले बाजार से बिजली खरीदनी पड़ती है, तो बाजार की कीमतों का असर उसकी लागत पर पड़ता है। दीर्घकालिक अनुबंध इस अनिश्चितता को सीमित कर सकते हैं। प्रेस नोट के अनुसार इस व्यवस्था से ऊर्जा जरूरत पूरी करने के लिए एनर्जी एक्सचेंजों पर निर्भरता अत्यंत कम हो जाएगी।
उत्तराखंड के लिए ‘ऊर्जा सुरक्षा कवच’ बनेगा यह फ़ैसला
हालांकि, इस फैसले की वास्तविक सफलता केवल 1320 मेगावाट बिजली खरीद लेने से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि यह बिजली राज्य के उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था तक कितनी कुशलता से पहुंचती है। ट्रांसमिशन नेटवर्क, वितरण व्यवस्था, लाइन लॉस में कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वसनीय आपूर्ति और भविष्य की बढ़ती मांग के अनुरूप ग्रिड क्षमता को भी साथ-साथ मजबूत करना होगा।
इसी तरह दीर्घकालीन बिजली खरीद को उत्तराखंड की अपनी जलविद्युत, सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा संभावनाओं के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक संतुलित ऊर्जा मिश्रण के हिस्से के रूप में देखना अधिक उपयोगी होगा।
यही वह बिंदु है जहां धामी सरकार की इस पहल का व्यापक विकास मॉडल सामने आता है। प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित ऊर्जा क्षमता को बनाए रखते हुए, दीर्घकालिक खरीद के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा का दूसरा मजबूत स्तंभ खड़ा करना राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

उत्तराखंड को यदि अगले दो-तीन दशकों में पर्यटन राज्य से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य उद्योग, सेवा क्षेत्र, आधुनिक विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और पर्यावरण-अनुकूल निवेश का केंद्र बनना है, तो ऊर्जा की विश्वसनीयता अनिवार्य होगी। 1320 मेगावाट की यह व्यवस्था उसी भविष्य के लिए अग्रिम तैयारी है।
इसलिए इस फैसले का मूल्यांकन केवल आज की बिजली जरूरत के संदर्भ में करना इसके महत्व को छोटा कर देगा। इसकी असली परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी। जब उत्तराखंड में नए उद्योग लगेंगे, पर्यटन का विस्तार होगा, शहर बढ़ेंगे और बिजली की मांग लगातार बढ़ेगी।
यदि उस समय राज्य के पास पर्याप्त, गुणवत्तापूर्ण और अपेक्षाकृत स्थिर लागत वाली बिजली उपलब्ध रही, तो आज लिया गया यह फैसला पीछे मुड़कर देखने पर उत्तराखंड की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।
विकास की सड़कें दिखाई देती हैं, औद्योगिक निवेश दिखाई देता है, पर्यटन की संभावनाएं दिखाई देती हैं लेकिन इन सबके पीछे ऊर्जा की वह अदृश्य शक्ति होती है जो पूरी अर्थव्यवस्था को चलाती है। धामी सरकार का यह निर्णय उसी अदृश्य शक्ति को अगले 25 वर्षों के लिए अधिक सुरक्षित और स्थिर करने की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है।
हम यह कह सकते हैं कि उत्तराखंड को वास्तविक अर्थों में ‘ऊर्जा प्रदेश’ बनाने की दिशा में यह एक बड़ा और दूरगामी कदम है। राज्य गठन के बाद ऊर्जा क्षेत्र में पहली बार इतने बड़े स्तर पर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में निर्णय लेकर धामी सरकार ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि बड़े और दूरगामी फैसले लेने का उसका विजन केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने की स्पष्ट प्रतिबद्धता भी रखता है।





