सितंबर के मध्य में संसद का विशेष सत्र संभव, कैबिनेट विस्तार के बाद परिसीमन पर तेज होगी चर्चा

नई दिल्ली: मोदी सरकार मध्य सितंबर के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण के लिए दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार की योजना विशेष सत्र से पहले कैबिनेट विस्तार के जरिए एनडीए में शामिल होने के इच्छुक दलों को साथ लाने की है।
विशेष सत्र और कैबिनेट विस्तार को लेकर अंतिम स्तर की चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मध्य एशिया दौरे से लौटने के बाद शुरू होने की बात कही गई है। विशेष सत्र का विकल्प खुला रखने के लिए मानसून सत्र के 15 दिन बीतने के बावजूद सत्रावसान नहीं किया गया है।
सरकार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, विशेष सत्र और कैबिनेट विस्तार के सामने फिलहाल दो बड़े पेच हैं। सरकार चाहती है कि विस्तार से पहले एनसीपी के दोनों धड़ों का विलय हो जाए और डीएमके सरकार का हिस्सा बने। दोनों मामलों में बातचीत अंतिम दौर में पहुंचने की बात कही गई है।
परिसीमन के मुद्दे पर सरकार ने डीएमके को राज्यों की सीटों की संख्या में आनुपातिक आधार पर 50 प्रतिशत बढ़ोतरी को विधेयक के मसौदे में लिखित रूप से शामिल करने का आश्वासन दिया है। वहीं, एनसीपी के दोनों धड़ों के विलय को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लगातार बातचीत कर रहे हैं। इन दोनों मामलों में हुई प्रगति की जानकारी प्रधानमंत्री मोदी को विदेश दौरे से लौटने के बाद दी जाएगी।
डीएमके की सहमति पर टिका विशेष सत्र का फैसला
परिसीमन के सवाल पर सरकार एनसीपी-एसपी के समर्थन को लेकर आश्वस्त बताई जा रही है, लेकिन डीएमके को लेकर मामला अभी अटका हुआ है। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना-यूबीटी और आम आदमी पार्टी में बड़ी टूट के साथ ही शरद पवार और अकाली दल के समर्थन के संकेत मिलने के बावजूद विशेष सत्र का रुख डीएमके की सहमति से प्रभावित हो सकता है।
डीएमके के पास लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 8 सांसद हैं। इनके समर्थन के बिना सरकार के लिए विधेयक पारित कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार, डीएमके के साथ सिर्फ परिसीमन पर ही नहीं बल्कि राजग में शामिल होने और कैबिनेट में प्रतिनिधित्व देने जैसे मुद्दों पर भी बातचीत चल रही है। डीएमके की सहमति मिलते ही विशेष सत्र और कैबिनेट विस्तार की रूपरेखा तैयार की जा सकती है।
कानून बनने के करीब तीन साल बाद मध्यस्थता परिषद का गठन
दूसरी ओर, कानून बनाए जाने के करीब तीन साल बाद केंद्र सरकार ने एक संसदीय समिति के सुझाव पर देश में मध्यस्थता की कार्यवाही को नियंत्रित करने के लिए मध्यस्थता परिषद का गठन किया है। केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से बृहस्पतिवार रात जारी अधिसूचना में 2023 के मध्यस्थता अधिनियम के तहत परिषद के गठन की घोषणा की गई।
कानून एवं कार्मिक मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति की रिपोर्ट इस महीने की शुरुआत में संसद में पेश की गई थी। परिषद का काम संस्थागत विवादों के समाधान की प्रक्रिया को नियंत्रित करना होगा।
इसके अलावा, मध्यस्थता सेवाएं उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं और मध्यस्थता का प्रशिक्षण एवं प्रमाणन देने वाले संस्थानों को मान्यता देने की जिम्मेदारी भी परिषद को सौंपी गई है। पिछले साल अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी के लिए मानव संसाधनों की कमी और वैधानिक संस्थाओं के लिए योग्य उम्मीदवार तलाशने में आने वाली कठिनाइयों को जिम्मेदार बताया था।
2023 में जारी हुई थी शुरुआती अधिसूचना
संसदीय समिति ने भारत की मध्यस्थता व्यवस्था पर अपनी रिपोर्ट में कानून मंत्रालय के उस स्पष्टीकरण का उल्लेख किया था, जिसमें कहा गया था कि मध्यस्थता अधिनियम को पूरी तरह लागू करने के लिए भारतीय मध्यस्थता परिषद का गठन एक महत्वपूर्ण पूर्व शर्त है। इसके साथ ही विस्तृत नियम और विनियम तैयार करना भी जरूरी बताया गया था।
भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन और उसके कामकाज से जुड़े शुरुआती प्रावधानों की अधिसूचना 9 अक्तूबर 2023 को जारी की गई थी। इसके बाद परिषद की संरचना और सदस्यों की सेवा शर्तों से संबंधित नियम भी लागू किए गए।



