7.8% की रफ्तार से दौड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था, अब तेल से लेकर रुपये तक सामने हैं 5 बड़े इम्तिहान

नई दिल्ली: अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बीच 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के 7 प्रतिशत के अनुमान से भी अधिक रहा। इसी अवधि में वास्तविक सकल मूल्य वर्धन 8.2 प्रतिशत और नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद 10.3 प्रतिशत बढ़ा। वैश्विक स्तर पर देखें तो इसी तिमाही में अमेरिका की अर्थव्यवस्था 1.5 प्रतिशत, चीन की 4.3 प्रतिशत और ब्रिटेन की महज 0.4 प्रतिशत बढ़ी।
विनिर्माण और सेवा क्षेत्र ने दिया मजबूत सहारा
जून तिमाही में अर्थव्यवस्था के लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रों में अच्छी वृद्धि दर्ज की गई। विनिर्माण क्षेत्र 9.2 प्रतिशत, निर्माण क्षेत्र 7.7 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र 10 प्रतिशत की दर से बढ़ा। निजी उपभोग में 7.1 प्रतिशत और वास्तविक सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। निर्यात भी 12 प्रतिशत बढ़ा।
निवेश में तेजी का असर अर्थव्यवस्था में दिखाई दिया। सकल घरेलू उत्पाद में निवेश की हिस्सेदारी 31.4 प्रतिशत से बढ़कर 34.3 प्रतिशत हो गई। इसके मुकाबले सरकारी खपत में 4.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। इससे संकेत मिला कि इस तिमाही की आर्थिक रफ्तार को निजी क्षेत्र और निवेश से मजबूत समर्थन मिला।
कंपनियों का मुनाफा बढ़ा, बैंक ऋण में भी तेजी
सूचीबद्ध कंपनियों के परिचालन मुनाफे में 19.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। बैंक ऋण की वृद्धि दर भी 19.3 प्रतिशत रही। शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दोगुना होकर 7.8 अरब डॉलर पहुंच गया। वहीं, केंद्र सरकार के शुद्ध कर राजस्व में 17.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
महंगे कच्चे तेल के बीच महंगाई पर नियंत्रण
इस अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव रहा। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में यातायात सामान्य स्तर की तुलना में काफी कम रहा और ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसके बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया। घरेलू महंगाई पर भी इसका असर सीमित रहा और घरेलू उपभोग अपस्फीतिकारक 2.6 प्रतिशत रहा, जबकि आयात अपस्फीतिकारक 30 प्रतिशत से अधिक था।
एफसीएनआर(बी) स्वैप सुविधा के जरिए करीब 65.4 अरब डॉलर जुटाए गए। इससे रुपये पर दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिली। खाद्यान्न का भंडार भी निर्धारित बफर मानक से करीब 4.7 गुना रहा, जिससे कमजोर मानसून की स्थिति में अनाज की कीमतों को काबू में रखने में मदद मिली।
अब अर्थव्यवस्था के सामने 5 बड़ी चुनौतियां
जून तिमाही में मजबूत वृद्धि के बावजूद अगले तीन तिमाहियों में अर्थव्यवस्था के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें कच्चे तेल की कीमत, मानसून, रुपये पर दबाव, निर्यात पर अमेरिकी शुल्क का असर और निजी निवेश को आगे बढ़ाने की चुनौती शामिल है।
1. महंगा कच्चा तेल बढ़ा सकता है दबाव
अगस्त में भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 89.7 डॉलर प्रति बैरल रही। मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार, निकट अवधि में कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं है। घरेलू ईंधन की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने राजस्व पर दबाव स्वीकार किया। प्रमुख सब्सिडी में 37.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि उत्पाद शुल्क संग्रह 22.4 प्रतिशत घट गया।
नीति के स्तर पर उत्पाद शुल्क को एक बफर की तरह इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत कच्चा तेल महंगा होने पर उत्पाद शुल्क घटाया जाए और कीमतों में कमी आने पर इसे धीरे-धीरे बहाल किया जाए।
2. कमजोर मानसून से खाद्य महंगाई का खतरा
मानसून की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है। जून के अंत में बारिश की कमी 38 प्रतिशत थी, जो जुलाई के अंत तक घटकर 13 प्रतिशत रह गई। खरीफ की बुवाई भी सामान्य क्षेत्र के करीब 92 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसके बावजूद चारों प्रमुख मौसम क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम है। भारतीय मौसम विभाग ने अगस्त और सितंबर में बारिश के दीर्घकालिक औसत से 94 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान जताया है।
कुछ खाद्य वस्तुओं पर इसका असर दिखने लगा है। मांस, अंडे और मसालों की महंगाई पहले ही 12 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो सरकार को खुले बाजार में चावल और गेहूं जारी करने, दालों और खाद्य तेलों पर आयात शुल्क अस्थायी रूप से कम करने तथा प्रभावित जिलों में ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों का विस्तार करने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
3. रुपये की कमजोरी और अतिरिक्त नकदी की चुनौती
रुपया 95.7 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है। 31 अगस्त को एफसीएनआर(बी) सुविधा भी बंद हो गई। इस व्यवस्था के दौरान डॉलर के बदले जारी हुए रुपये से बैंकिंग व्यवस्था में अतिरिक्त नकदी बढ़ी। अगस्त में प्रतिदिन औसत नकदी अवशोषण करीब 3.48 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि जून में यह लगभग 89,000 करोड़ रुपये था।
अब भारतीय रिजर्व बैंक के सामने अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने की चुनौती है, ताकि इससे जरूरत से ज्यादा ऋण वृद्धि को बढ़ावा न मिले। मौजूदा समय में बैंक ऋण करीब 19.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जबकि जमा वृद्धि 15.4 प्रतिशत है।
4. अमेरिकी शुल्क से रोजगार देने वाले निर्यात क्षेत्र प्रभावित
24 जुलाई से अतिरिक्त 10 प्रतिशत धारा 301 शुल्क लागू हुआ। हालांकि स्मार्टफोन, पेट्रोलियम उत्पाद और दवा जैसे कई उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है। इसी वजह से जुलाई में अमेरिका को भारत का निर्यात 12.9 प्रतिशत बढ़ा।
इसके बावजूद कपड़ा, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा और सिरेमिक जैसे रोजगार आधारित क्षेत्रों के निर्यात में गिरावट दर्ज की गई। ऐसे में श्रम-प्रधान निर्यातकों के लिए ब्याज सहायता, निर्यात प्रोत्साहन और अन्य लक्षित राहत उपाय जारी रखना अहम माना जा रहा है। इसके साथ ही यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौतों को जल्द पूरा करने पर भी जोर है।
5. अब निजी निवेश को संभालनी होगी विकास की कमान
जून तिमाही में सरकार का पूंजीगत व्यय 23.7 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन एक साल पहले इसी अवधि में वृद्धि 52 प्रतिशत थी। ऐसे में अब बड़ी चुनौती यह है कि सार्वजनिक निवेश के बाद निजी क्षेत्र विकास की कमान संभाले।
जून तिमाही में इसके शुरुआती संकेत जरूर मिले हैं। पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन 15.2 प्रतिशत बढ़ा, जबकि मशीनरी के आयात में 51.5 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि निजी निवेश की गतिविधियों में गति बन रही है, लेकिन आने वाली तिमाहियों में इस रफ्तार को बनाए रखना अर्थव्यवस्था के लिए अहम होगा।



