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शाहरुख खान की फिल्मों की फैन रहीं राधिका आप्टे, बोलीं- पुराने सिनेमा में महिलाओं के ‘न’ को भी नजरअंदाज किया जाता था

नई दिल्ली: अभिनेत्री राधिका आप्टे ने पुरानी हिंदी रोमांटिक फिल्मों में प्रेम, आकर्षण और इच्छा को दिखाने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उनके दौर से पहले बनी कई फिल्मों में महिलाओं का पीछा करने और उनकी असहमति को नजरअंदाज करने जैसी स्थितियों को रोमांस के रूप में पेश किया जाता था। उनके मुताबिक, हिंदी सिनेमा में समय के साथ बदलाव आया है, लेकिन इस दिशा में अभी भी काफी काम किए जाने की जरूरत है।

पुरानी फिल्मों को दोबारा देखकर बदला नजरिया

राधिका आप्टे ने पुरानी फिल्मों को दोबारा देखने के अपने अनुभव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि किशोरावस्था में जिन चीजों को रोमांटिक कल्पना का हिस्सा समझा जाता था, उन्हें आज अलग नजरिए से देखने पर कई बार परेशान करने वाला अनुभव होता है।

अभिनेत्री ने खास तौर पर ऐसी कहानियों का जिक्र किया, जिनमें महिला पात्र के मना करने के बावजूद पुरुष उसका पीछा करता रहता है और फिल्म में इसे प्रेम या आकर्षण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।

शाहरुख खान की फैन होने के बावजूद उठाए सवाल

राधिका ने यह भी बताया कि वह शाहरुख खान की बड़ी प्रशंसक रही हैं। हालांकि, उनकी पसंद की कुछ पुरानी फिल्मों को दोबारा देखने पर उन्हें लगा कि कई दृश्यों में महिला पात्र की असहमति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

उनके अनुसार, उस दौर में महिलाओं का पीछा करने को रोमांस के रूप में स्वीकार करने वाली प्रस्तुति फिल्मों में आम थी।

महिलाओं को देखने के पुरुष-केंद्रित नजरिए पर सवाल

राधिका ने सिनेमा में महिलाओं को पेश करने के नजरिए पर भी सवाल उठाया। उन्होंने महिलाओं के यौन चित्रण का जिक्र करते हुए कहा कि एक तरफ उन्हें जरूरत से ज्यादा यौन रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि दूसरी तरफ उन्हें आदर्श और नैतिकता के ऊंचे मानकों पर रखने की कोशिश की गई।

उनके मुताबिक, इन दोनों तरह की प्रस्तुतियों के बीच मौजूद विरोधाभास को समझना जरूरी है।

शकुन बत्रा ने राज कपूर की फिल्मों का दिया उदाहरण

इस बातचीत में निर्देशक शकुन बत्रा ने पुराने हिंदी सिनेमा का संदर्भ दिया। उन्होंने राज कपूर की फिल्मों का उदाहरण देते हुए कहा कि शाहरुख खान के बॉलीवुड में आने से काफी पहले भी फिल्मों में इच्छा और आकर्षण को दिखाने के प्रयास किए जाते थे। उन्होंने ‘राम तेरी गंगा मैली’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्मों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया।

राधिका बोलीं- यह भी देखना जरूरी है कि महिला को कैसे दिखाया गया

राधिका ने इस नजरिए के दूसरे पहलू पर जोर दिया। उनका कहना था कि पुराने दौर की फिल्मों में इच्छा दिखाने के दौरान भी नजर अक्सर पुरुष की होती थी और महिला पात्रों को उसी नजरिए से पेश किया जाता था।

उन्होंने कहा कि किसी दृश्य में इच्छा या आकर्षण दिखा देना अपने आप में प्रगतिशील प्रस्तुति नहीं माना जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि उस दृश्य में महिला पात्र को किस तरह पेश किया गया है और उसकी इच्छा या असहमति को कितना महत्व दिया गया है।

सिनेमा समाज की सोच को भी प्रभावित करता है

राधिका के मुताबिक फिल्मों का प्रभाव समाज की सोच पर पड़ता है। कई बार सिनेमा में दिखाई गई चीजें लोगों की प्रेम और आकर्षण को लेकर समझ का हिस्सा बन जाती हैं।

उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की ओर से ध्यान न देना या गलत व्यवहार करना ही आकर्षण की निशानी समझी जाने लगे, तो ऐसी धारणा को बदलने में लंबा समय लग सकता है।

आने वाली पीढ़ियां आज की फिल्मों पर भी उठा सकती हैं सवाल

शकुन बत्रा ने कहा कि भविष्य में आने वाली पीढ़ियां आज की फिल्मों को भी अलग नजरिए से देख सकती हैं। जिस तरह वर्तमान समय में पुरानी फिल्मों को नए सामाजिक नजरिए से देखा जा रहा है, उसी तरह आने वाले वर्षों में मौजूदा फिल्मों की कहानियों और प्रस्तुतियों की भी समीक्षा हो सकती है।

बातचीत में दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी सिनेमा ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन महिलाओं, पुरुषों और समाज की बदलती समझ के अनुरूप कहानी कहने के तरीके में आगे भी बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है।

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