अद्धयात्मराज्य

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पहुंचे परमार्थ निकेतन, स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने किया स्वागत

आध्यात्मिक ऊर्जा से स्पंदित परमार्थ निकेतन प्रांगण में वैदिक परंपरा के साथ उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का भव्य अभिनन्दन।

Rishikesh News: हिमालय की गोद और मां गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक प्रांगण आज भारत के संवैधानिक जीवन की एक गरिमामयी यात्रा को जीने वाले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का आगमन हुआ। यह भारत की संवैधानिक चेतना, आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रसेवा के मूल्यों का दिव्य संगम है।
‘अतिथि देवो भवः’ की अनुभूति
परमार्थ निकेतन की पावन धरती पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी एवं उनकी धर्मपत्नी सुदेश धनखड़ जी का स्वागत परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों एवं आचार्यों ने शंखनाद, पुष्पवर्षा और वेदमंत्रों की मंगलमय ध्वनि के साथ किया। वैदिक परम्परा की यह अभिनन्दन-वेला भारत की उस सनातन संस्कृति का जीवंत दर्शन है, जहाँ ‘अतिथि देवो भवः’ की अनुभूति होती है।

विभिन्न समसामयिक विषयों पर सार्थक संवाद
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का आत्मीय अभिनन्दन किया। इस अवसर पर तीनों विभूतियों के मध्य राष्ट्र, समाज, संस्कृति, पर्यावरण, शिक्षा, युवा पीढ़ी तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत सहित विभिन्न समसामयिक विषयों पर सार्थक संवाद हुआ।
भारतीय माटी से जुड़ी सहजता का अद्भुत समन्वय
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी का सार्वजनिक जीवन संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों, विधि के शासन और राष्ट्रहित के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का अनुपम संगम है। एक अधिवक्ता, जनप्रतिनिधि, राज्यपाल और देश के उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने सार्वजनिक जीवन के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। उनके व्यक्तित्व में संवैधानिक मर्यादा और भारतीय माटी से जुड़ी सहजता का अद्भुत समन्वय है।

साधना और प्रकृति के प्रति श्रद्धा में भी निहित
परमार्थ निकेतन में संविधान की मर्यादा और संस्कृति की चेतना एक-दूसरे के सम्मुख नहीं, बल्कि साथ-साथ दिखाई दीं। पूज्य स्वामी जी ने सदैव देव भक्ति व देशभक्ति साथ साथ के इस भाव को आगे बढ़ाया। उनका अद्भुत चिंतन है कि भारत की शक्ति केवल उसकी भौतिक प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, करुणा, सेवा, साधना और प्रकृति के प्रति श्रद्धा में भी निहित है।
परमार्थ निकेतन को आध्यात्मिक जागरण का वैश्विक केन्द्र बनाया
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती का जीवन स्वयं ‘सेवा को साधना और साधना को सेवा’ बनाने का प्रेरणादायक उदाहरण है। गंगा स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, योग, भारतीय संस्कृति तथा वैश्विक शांति के लिए उनके निरंतर प्रयासों ने परमार्थ निकेतन को सेवा और आध्यात्मिक जागरण का एक वैश्विक केन्द्र बनाया है।
भारत की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी में
पूज्य स्वामी ने कहा कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में है और भारत की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी में। जब हमारी युवा शक्ति अपनी जड़ों से जुड़ेगी, आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कारों को आत्मसात करेगी और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाएगी, तभी विकसित भारत का संकल्प वास्तव में साकार होगा। उन्होंने कहा कि आज भारत विश्व को केवल आर्थिक विकास का मॉडल नहीं, बल्कि मानवता, पर्यावरणीय संतुलन, योग, शांति और सह-अस्तित्व की जीवनदृष्टि भी दे रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस हेतु स्वयं प्रतिबद्ध हैं।

भारत की पहचान उसकी समृद्ध आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी ने कहा कि भारत की पहचान उसकी समृद्ध आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से है। माँ गंगा के पावन तट पर आकर एक अद्भुत शांति और ऊर्जा की अनुभूति हो रही है। उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन द्वारा सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता और मानव कल्याण के लिए किए जा रहे कार्य अत्यंत प्रेरणादायी हैं। उन्होंने परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों की वैदिक शिक्षा और भारतीय संस्कारों के संरक्षण की सराहना की। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि हमारी युवा पीढ़ी आधुनिक ज्ञान के साथ अपनी संस्कृति, परम्पराओं और नैतिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़े, क्योंकि यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है।
आध्यात्मिक परम्परा की उस व्यापक दृष्टि को रेखांकित किया
पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती ने भी इस अवसर पर भारतीय आध्यात्मिक परम्परा की उस व्यापक दृष्टि को रेखांकित किया, जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानती है। उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत का संदेश किसी एक वर्ग, क्षेत्र या राष्ट्र तक सीमित नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की वैश्विक चेतना से जुड़ा है।

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