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काला सागर में ड्रोन हमलों से बढ़ा खतरा, भारत पर भी पड़ेगा असर; गेहूं, तेल और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर बढ़ी चिंता

नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध अब सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रह गया है। काला सागर में लगातार हो रहे ड्रोन हमलों ने व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए भी खतरा बढ़ा दिया है। इस समुद्री क्षेत्र से गेहूं, मक्का, तेल और खाद की बड़ी सप्लाई दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचती है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के साथ भारत के लिए भी चिंता बढ़ा सकता है। हाल के हमलों में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए हैं। Pasted text

काला सागर इतना अहम क्यों है?

काला सागर यूरोप और एशिया के बीच स्थित बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इसके किनारे रूस, यूक्रेन, तुर्किये, बुल्गारिया, रोमानिया और जॉर्जिया हैं। हालांकि इसका महत्व सिर्फ इन देशों तक सीमित नहीं है। यहां से निकलने वाला अनाज, तेल और अन्य जरूरी सामान हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के बाजारों तक पहुंचता है। इसलिए समुद्री रास्तों में बड़ी रुकावट आने पर खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। Pasted text

दुनिया के गेहूं कारोबार में बड़ी हिस्सेदारी

काला सागर के बंदरगाहों से हर साल करोड़ों टन अनाज अलग-अलग देशों को भेजा जाता है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के निर्यात होने वाले गेहूं का करीब एक चौथाई हिस्सा सप्लाई करते हैं। रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक है, जबकि यूक्रेन गेहूं और मक्का का बड़ा सप्लायर है।

अगर समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही रुकती या धीमी होती है तो मिस्र, बेरूत और नैरोबी जैसे बाजारों में रोटी और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ता है जो खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

तेल की सप्लाई के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण

काला सागर रूस के तेल कारोबार का बड़ा केंद्र है। रूस के समुद्री टर्मिनलों से रोज करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल गुजरता है। नोवोरोसिस्क रूस का प्रमुख दक्षिणी तेल निर्यात केंद्र है। इसके पास कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम का समुद्री टर्मिनल भी है, जो कजाखस्तान के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा संभालता है।

इन टर्मिनलों से तेल की आवाजाही प्रभावित होने पर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। एशिया की रिफाइनरियों तक पहुंचने वाली सप्लाई भी इससे प्रभावित हो सकती है।

काला सागर से बाहर निकलने का रास्ता भी सीमित

काला सागर की भौगोलिक स्थिति इसे और संवेदनशील बनाती है। यह सीधे खुले समुद्र से नहीं जुड़ा है। यहां से निकलने वाले जहाजों को तुर्किये के बोस्फोरस से गुजरना पड़ता है। इसके बाद मरमारा सागर और फिर डार्डानेल्स के रास्ते भूमध्यसागर तक पहुंचा जाता है।

इन जलडमरूमध्यों पर 1936 की मॉन्ट्रो कन्वेंशन लागू होती है। यही रास्ता काला सागर को बाहरी दुनिया से जोड़ता है। इसलिए यहां संकट पैदा होने पर जहाजों के लिए कोई आसान वैकल्पिक समुद्री रास्ता उपलब्ध नहीं है।

समुद्री ड्रोन ने बदली युद्ध की रणनीति

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद काला सागर भी युद्ध का बड़ा मैदान बन गया। शुरुआत में यहां युद्धपोत, मिसाइल फ्रिगेट, तटीय मिसाइल सिस्टम और समुद्री सुरंगों का इस्तेमाल हुआ। लेकिन यूक्रेन के पास रूस जैसी बड़ी पारंपरिक नौसेना नहीं थी। इसके बाद उसने छोटे, कम लागत वाले और दूर से नियंत्रित होने वाले समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया।

विस्फोटक समुद्री ड्रोन ने रूस के लिए नई चुनौती खड़ी की और धीरे-धीरे काला सागर में युद्ध की रणनीति बदलने लगी।

सेवस्तोपोल से नोवोरोसिस्क तक बढ़ा दबाव

यूक्रेन ने रूस के ऐतिहासिक नौसैनिक केंद्र सेवस्तोपोल के आसपास लगातार समुद्री ड्रोन हमले किए। इन हमलों के चलते रूसी नौसेना को अपने कई बड़े युद्धपोत पूर्व की ओर नोवोरोसिस्क ले जाने पड़े।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नोवोरोसिस्क सिर्फ सैन्य केंद्र नहीं, बल्कि बड़ा व्यावसायिक केंद्र भी है। यहां से तेल और अन्य महत्वपूर्ण सामान का कारोबार होता है। ऐसे में जिस समुद्री क्षेत्र में रूसी युद्धपोत ड्रोन से बचने की कोशिश कर रहे हैं, उसी रास्ते से तेल, खाद और गेहूं ले जाने वाले व्यापारी जहाज भी गुजरते हैं।

व्यापारी जहाजों तक पहुंचा हमलों का खतरा

युद्ध शुरू होने के बाद से काला सागर में व्यापारी जहाजों के लिए जोखिम बना हुआ है, लेकिन अक्टूबर की शुरुआत में स्थिति और गंभीर हुई। यूक्रेनी मक्का लेकर जा रहे तुर्किये के एक कार्गो जहाज पर हमला हुआ। जहाज रोमानिया के विशेष आर्थिक क्षेत्र में डूब गया और दो नाविकों की मौत हो गई।

इसके 48 घंटे बाद बुल्गारिया के जलक्षेत्र में दो कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया गया। यह नाटो के किसी सदस्य देश के समुद्री क्षेत्र में इस तरह के हमलों का पहला मामला था। इसमें एक जहाज डूब गया और 10 नाविक लापता हो गए।

बुल्गारिया हमले में 7 भारतीय नाविक भी थे

बुल्गारिया के जलक्षेत्र में हमले का शिकार हुए दूसरे जहाज पर 18 चालक दल के सदस्य सवार थे। सभी को बचा लिया गया। इनमें सात भारतीय नाविक भी शामिल थे।

यह घटना इसलिए अहम है क्योंकि भारतीय नागरिक दुनिया के समुद्री व्यापार में बड़ी संख्या में काम करते हैं। युद्ध क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा सीधे उनकी जान को खतरे में डाल सकती है। लाल सागर और अदन की खाड़ी में ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच काम कर चुके भारतीय नाविक अब काला सागर में भी ऐसे ही जोखिम का सामना कर रहे हैं।

सोची के पास तेल टैंकर पर ड्रोन हमला

इसके बाद रूस के पर्यटन शहर सोची के तट के पास लाइबेरिया के झंडे वाले कच्चे तेल के टैंकर ‘अफ्रामैक्स रियो’ को समुद्री ड्रोन ने निशाना बनाया। हमले के बाद जहाज के डेक पर भीषण आग लग गई। आपातकालीन टग बोट ने आग बुझाने की कोशिश की और सभी 23 चालक दल के सदस्यों को बचा लिया गया।

इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और युद्ध के बीच की कड़ी को और साफ किया। जहाज लाइबेरिया के झंडे के नीचे था, उसके सभी क्रू सदस्य भारतीय थे और वह रूसी तट से लदा कच्चा तेल ले जा रहा था।

युद्ध क्षेत्र से सैकड़ों किलोमीटर दूर भी खतरा

‘अफ्रामैक्स रियो’ पर हमला सक्रिय युद्ध की अग्रिम पंक्ति से सैकड़ों किलोमीटर दूर हुआ। इससे संकेत मिलता है कि खतरा सिर्फ उस इलाके तक सीमित नहीं है जहां रूस और यूक्रेन की सेनाएं सीधे आमने-सामने हैं।

समुद्री ड्रोन काफी दूर तक पहुंचकर ऐसे जहाजों को भी निशाना बना सकते हैं जो सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं। जहाज का झंडा किस देश का है, उसमें कौन सा सामान है और चालक दल किस देश का है, इन सबके बावजूद समुद्र में मौजूद ड्रोन उसे संभावित लक्ष्य बना सकता है।

रूस और यूक्रेन जहाजों को क्यों बना रहे निशाना?

दोनों देश समुद्री सप्लाई लाइनों को युद्ध में रणनीतिक महत्व देते हैं। रूस यूक्रेन के डेन्यूब बंदरगाहों और तटीय भंडारण केंद्रों पर हमले करता है। रूस का दावा है कि इन स्थानों पर हथियारों की सप्लाई होती है।

दूसरी ओर, यूक्रेन तेल टैंकरों और ईंधन से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाता है। उसका उद्देश्य रूस की तेल से होने वाली कमाई को प्रभावित करना है, क्योंकि इसी आय से युद्ध के लिए संसाधन जुटाए जाते हैं। हालांकि इन हमलों के बीच सबसे बड़ा जोखिम उन नागरिक नाविकों पर है जिनका युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं है।

हमले बढ़े तो महंगा होगा समुद्री बीमा और माल ढुलाई

व्यापार के लिए समस्या सिर्फ जहाज पर सीधे हमले से नहीं पैदा होती। खतरा बढ़ते ही समुद्री बीमा कंपनियां युद्ध जोखिम का प्रीमियम बढ़ा देती हैं। काला सागर में हर नए हमले के साथ जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है।

इसके बाद जहाज मालिक ज्यादा जोखिम भत्ता मांगते हैं और माल ढुलाई का किराया बढ़ सकता है। बड़ी शिपिंग कंपनियां जोखिम वाले रास्तों से पीछे हट सकती हैं। इससे सप्लाई और महंगी होने के साथ पुराने जहाजों पर निर्भरता बढ़ने की स्थिति भी बन सकती है।

आम लोगों की जेब तक पहुंचेगा असर

समुद्र में बढ़ते जोखिम का असर आखिरकार आम लोगों तक पहुंच सकता है। जहाजों का बीमा और माल ढुलाई महंगी होने पर डीजल, तेल और आटे जैसी चीजों की कीमत बढ़ सकती है। अगर कंपनियां काला सागर को प्रतिबंधित क्षेत्र मानने लगती हैं तो सप्लाई और महंगी हो सकती है।

अनाज को लेकर चिंता खास तौर पर बढ़ी हुई है। 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि कुछ बड़े अनाज निर्यातकों को खासकर काला सागर के रास्ते माल भेजने में परेशानी हो सकती है।

भारत ने रूस और यूक्रेन से बढ़ाई बातचीत

एस. जयशंकर ने यह भी बताया था कि खाद की कमी बढ़ रही है और भारत सुरक्षित काला सागर शिपिंग बहाल करने के लिए रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत कर रहा है। यानी भारत की भूमिका सिर्फ चिंता जताने तक सीमित नहीं है।

भारत के लिए यह मुद्दा खाद्य सुरक्षा के साथ अपने नागरिकों की सुरक्षा से भी जुड़ा है। दुनिया के वाणिज्यिक समुद्री कर्मचारियों में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी 10 फीसदी से अधिक है। ऐसे में काला सागर में बढ़ता खतरा भारत के लिए आर्थिक और मानवीय दोनों तरह की चिंता पैदा करता है।

भारत की कूटनीति का दायरा बढ़ा

भारतीय कोशिशों की शुरुआत व्यापारी जहाजों में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा से हुई, लेकिन बाद में इसका दायरा अनाज और ऊर्जा ढांचे तक पहुंच गया। यूक्रेन ने भारत, अमेरिका, तुर्किये और मिस्र की ओर से दिए गए चार अलग-अलग युद्धविराम प्रस्ताव मिलने की पुष्टि की है।

यूक्रेन के मुताबिक भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक था, क्योंकि इसमें समुद्री स्थिरता के साथ ऊर्जा से जुड़े ढांचे को भी शामिल किया गया था। हालांकि इन प्रस्तावों को जमीन पर लागू करना चुनौतीपूर्ण है। रूस समुद्री हमलों पर औपचारिक रोक लगाने का विरोध कर रहा है, क्योंकि व्यापारिक ढांचे पर दबाव उसके लिए युद्ध में महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है।

एक ही समुद्र में युद्ध और कूटनीति साथ-साथ

काला सागर में इस समय एक अनोखी स्थिति बनी हुई है। जिस समुद्र में ड्रोन सैन्य जहाजों और तेल टैंकरों को निशाना बना रहे हैं, उसी समुद्र में सुरक्षित व्यापार के लिए कूटनीतिक बातचीत भी चल रही है।

यानी सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों का केंद्र एक ही समुद्र है। यही वजह है कि काला सागर अब सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच चल रही लड़ाई का हिस्सा नहीं रह गया है। यहां वैश्विक खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सप्लाई, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ गई है।

काला सागर का असर दुनिया के बाजारों तक जाएगा

रूस और यूक्रेन जमीन और संप्रभुता को लेकर लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार पूरी दुनिया से जुड़े हैं। काला सागर से निकलने वाला गेहूं अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के देशों तक पहुंचता है, जबकि यहां से जाने वाला तेल वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है।

भारतीय नाविक इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का अहम हिस्सा हैं और अब उनकी सुरक्षा भी खतरे में है। इसलिए काला सागर में होने वाला हर ड्रोन हमला सिर्फ एक जहाज या एक देश की समस्या नहीं है। यहां की स्थिति आगे चलकर दुनिया के खाद्य बाजार, ईंधन की कीमतों और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती है।

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