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पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार, स्वस्थ जीवन का आधार

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह (01-07 सितम्बर) पर विशेष

मुकेश शर्मा

“आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनं” अर्थात निरोगी होना सबसे बड़ा भाग्य है और बेहतर स्वास्थ्य से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं। संसार की सारी सुख-सुविधाओं, खुशियों और धन-दौलत का भोग भी तभी किया जा सकता है जब निरोगी काया हो। बेहतर स्वास्थ्य नियमित आहार-विहार के पालन से ही प्राप्त हो सकता है। इसके लिए जहाँ जीवनशैली को नियमित बनाने और शारीरिक श्रम को तरजीह देने की जरूरत है वहीँ खानपान का भी ख़ास ख्याल रखने की जरूरत है। सही खानपान और पोषण के बारे में समुदाय में जागरूकता की अलख जगाने के उद्देश्य से ही हर साल एक से सात सितम्बर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। इसका मूल उद्देश्य समुदाय को स्थानीय स्तर पर सर्वसुलभ पोषक तत्वों से भरपूर मौसमी फलों-सब्जियों और अनाज के बारे में जागरूक बनाना है क्योंकि पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार ही स्वस्थ जीवन का आधार है।

सही पोषण हालांकि हर आयुवर्ग के लिए बहुत ही जरूरी है किन्तु गर्भवती, बच्चों और किशोर-किशोरियों के पोषण का खास ख्याल रखने की जरूरत होती है क्योंकि यह ऐसी अवस्था होती है जहाँ पर इस वर्ग को एक बड़े बदलाव का सामना करना होता है। गर्भवती को अपने साथ ही गर्भस्थ शिशु के पोषण का ख्याल रखना होता है तो वहीँ बच्चों को शारीरिक वृद्धि के लिए पोषण खास अहमियत रखता है। दूसरी ओर किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों के लिहाज से भी सही पोषण उनके लिए नितांत आवश्यक है। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि ऐसे में सिर्फ भरपेट भोजन पर्याप्त होता है बल्कि भोजन में इस तरह के खाद्य समूहों का चयन करना जरूरी होता है जिससे कि शरीर को पर्याप्त मात्रा में आयरन, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि मिल सके। इसीलिए दादी-नानी की रसोई पोषक तत्वों से भरपूर हुआ करती थीं, जैसे- मोटे अनाज (मिलेट्स), दालें, मौसमी फल व सब्जियां, घर का बना दही, नट्स, बीज और पारम्परिक डेयरी उत्पाद आदि । पैकेट बंद खाद्य पदार्थों ने इनमें से कई चीजों को आज पीछे छोड़ दिया है, ऐसे में हमें स्वाद तो भरपूर मिल जाता है लेकिन पोषण की मात्रा नदारद होती है। ऐसे में हमें आज भी दादी-नानी की रसोई से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, जैसे- खाने में विविधता का ख्याल रखना, मौसम के अनुसार खाद्य पदार्थों को चुनना, संतुलन और कम से कम प्रोसेसिंग आदि।

समुदाय में लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि छह माह से ऊपर के बच्चों के मामले में आहार विविधता, मात्रा, आवृत्ति और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों के माध्यम से आयरन युक्त भोजन का खास ख्याल रखा जाए, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करने पर विशेष ध्यान दिया जाए। किशोरावस्था में शरीर के सम्पूर्ण विकास के लिए आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन की अधिक मात्रा की जरूरत होती है। ऐसे में उनके भोजन में हरे पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें ताकि भरपूर मात्रा में शरीर को आयरन की मात्रा मिल सके। इन सब्जियों में स्थानीय स्तर पर पर्याप्त मात्रा में मिलने वाली भिंडी, मटर, सेम की फलियाँ, चौलाई, पालक, बथुआ, मेथी, सहजन और सरसों के साग को शामिल किया जा सकता है। यह सब्जियां हीमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत ही मददगार साबित होती हैं। इनके अवशोषण को बढ़ाने के लिए इनमें नींबू या टमाटर के साथ पकाकर खाना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। पालक और सहजन में जहाँ आयरन की मात्रा भरपूर होती है वहीँ मेथी में आयरन के साथ फाइबर और अन्य पोषक तत्व भी उच्च मात्रा में होते हैं।

बेहतर स्वास्थ्य के लिए स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध मोटा अनाज और दाल को भी जरूर प्राथमिकता दें। इनमें मक्का, बाजरा, रागी, ज्वार, राजमा, नट्स, चना दाल, काला चना, सोयाबीन और मसूर आदि को भोजन में शामिल कर बेहतर स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है। दैनिक आहार में पीले एवं नारंगी फलों को भी शामिल करके शरीर को आकर्षक बनाया जा सकता है। इनमें पपीता, आम, खरबूज, कद्दू, गाजर आदि को शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा तिल, गुड़, चना और अलसी भी शरीर के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं। थाली में विटामिन-सी युक्त आहार को भी शामिल करना आवश्यक होता है क्योंकि बेहतर स्वास्थ्य में यह बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके लिए जरूरी है कि अंकुरित चना/दाल, आंवला, नींबू, संतरा, टमाटर, अंगूर, अमरूद आदि से युक्त विविधता वाली थाली को जरूर अपनाएं। मुख्य भोजन के साथ इनमें से कई चीजों को सलाद के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह सभी ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो स्थानीय स्तर पर मौसम के अनुरूप आसानी से कम कीमत पर मिल सकते हैं, बस जरूरत है इनको अपनाने की। समुदाय में इस बारे में जागरूकता की भी जरूरत है ताकि उनको ज्ञात हो सके कि शरीर को भरपूर ऊर्जा के लिए जहाँ कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है वहीँ मांशपेशियों की मजबूती और वृद्धि के लिए शरीर को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन की भी जरूरत होती है। इसी प्रकार वसा, विटामिन, खनिज और पानी भी स्वस्थ शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं। इन सबके साथ यह भी बहुत जरूरी है कि खाना बनाने और खाने से पहले हाथों को साबुन-पानी से अच्छी तरह से अवश्य धुलें।

विकसित भारत-2047 के संकल्प को साकार करने के लिए भी देश के हर नागरिक का स्वस्थ और निरोगी होना बहुत जरूरी है। इसकी तैयारी में अभी से ही जुटना आवश्यक है। इसके लिए खुद के साथ ही परिवार के हर सदस्य के सही पोषण और सही स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाए ताकि विकसित भारत का मार्ग आसानी से प्रशस्त हो सके। बेहतर स्वास्थ्य के बल पर ही लोग कार्यस्थल पर बेहतर कार्य प्रदर्शन कर सकते हैं और आर्थिक उत्पादकता की वृद्धि में सहायक बन सकते हैं। सही पोषण और सही स्वास्थ्य से गाढ़ी कमाई बेवजह इलाज पर नहीं खर्च करनी पड़ेगी। कुपोषण और बीमारियों से सुरक्षित रहकर ही बच्चों का समग्र शारीरिक और मानसिक विकास संभव है, जो कि आगे चलकर राष्ट्रहित में सहायक साबित हो सकते हैं। इस तरह यह सोने पर सुहागा जैसा ही होगा कि जब हम विकसित भारत को स्वस्थ विकसित भारत गर्व से कह सकेंगे। इस तरह कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी सही आहार, सही दिनचर्या और सही जीवन शैली में निहित है। सही आहार के चयन के साथ ही उसको ग्रहण करने के सही समय का पालन करना भी जरूरी होता है। पीने का पानी भी स्वच्छ होना चाहिए। इसके साथ ही व्यस्ततम रूटीन के बाद भी अपने लिए प्रतिदिन एक घंटे का समय अवश्य निकालें और कुछ न कुछ शारीरिक श्रम, योग, प्राणायाम, ध्यान या कसरत अवश्य करें। इससे पाचन क्रिया जहाँ दुरुस्त होगी वहीँ कार्य के प्रति एकाग्रता भी बढ़ेगी। फ़ास्ट फ़ूड की जगह घर का बना शुद्ध और ताजा खाना ही खाएं। किसी भी तरह के नशे से दूरी बनाकर रहने में ही घर-परिवार और खुद की भलाई है।

(लेखक पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)

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