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Chaturmas 2026 Date: 4 महीने तक क्यों थम जाते हैं शुभ कार्य? जानिए कब से शुरू होगा चातुर्मास और क्या हैं इसके नियम

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह चार महीने की पवित्र अवधि भगवान विष्णु की उपासना, व्रत, तप, जप और आत्मसंयम को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है और इसका समापन देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी के दिन होता है।

पंचांग के मुताबिक वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को पड़ रही है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होगा। यह पवित्र काल 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ समाप्त होगा। चातुर्मास के दौरान श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास शामिल होते हैं।

चातुर्मास का धार्मिक महत्व क्या है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ, उपनयन और अन्य मांगलिक कार्यों को स्थगित रखने की परंपरा है। मान्यता है कि देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के बाद ही शुभ और मांगलिक कार्यों की दोबारा शुरुआत होती है।

राजा बलि और वामन अवतार से जुड़ी है मान्यता

चातुर्मास से संबंधित एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। तब भगवान विष्णु वामन रूप में उनके पास पहुंचे और तीन पग भूमि दान में मांगी। दो पग में उन्होंने पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, जबकि तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु इन चार महीनों के दौरान राजा बलि के लोक में निवास करते हैं।

चातुर्मास में क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?

धार्मिक परंपराओं के अनुसार चातुर्मास सांसारिक उत्सवों की अपेक्षा भक्ति, साधना और आत्मिक उन्नति का समय माना जाता है। यही कारण है कि विवाह, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश और अन्य बड़े शुभ कार्य इस अवधि में नहीं किए जाते।

हालांकि नियमित पूजा-पाठ, सत्यनारायण कथा, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान पूरे चातुर्मास के दौरान किए जा सकते हैं। माना जाता है कि इस समय किए गए आध्यात्मिक प्रयासों का विशेष फल प्राप्त होता है।

चातुर्मास में खानपान से जुड़े प्रमुख नियम

चातुर्मास के दौरान सात्विक जीवनशैली अपनाने और खानपान में संयम रखने की परंपरा है। कई श्रद्धालु इस अवधि में गुड़, तेल, बैंगन, प्याज, लहसुन और अत्यधिक मसालेदार भोजन से दूरी बनाते हैं।

महीनों के अनुसार भी कुछ विशेष नियम बताए गए हैं।

  • श्रावण मास में पालक और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता।
  • भाद्रपद मास में दही से परहेज करने की परंपरा है।
  • आश्विन मास में दूध का त्याग करने का नियम माना जाता है।
  • कार्तिक मास में मांसाहार, विशेष रूप से मछली का सेवन वर्जित माना गया है।

चातुर्मास में पूजा-अर्चना कैसे करें?

चातुर्मास का पालन घर पर रहकर भी किया जा सकता है। इसके लिए नियमित पूजा और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है।

  • ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठकर भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • दीपक जलाकर तुलसी दल अर्पित करें।
  • विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि मंत्र या हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें।
  • कम से कम एकादशी व्रत का पालन अवश्य करें।
  • किसी प्रिय वस्तु या आदत का त्याग कर संकल्प लें।
  • भागवत पुराण, रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ एवं श्रवण करें।
  • अन्नदान, जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक सेवा जैसे पुण्य कार्य करें।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस दौरान किए गए जप, तप, व्रत और सेवा कार्यों से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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