स्वास्थ्य

रातभर नहीं आती सुकून की नींद? जानिए स्लीप डिसऑर्डर के लक्षण, कारण और कब तुरंत लें डॉक्टर की सलाह

नई दिल्ली: अच्छी सेहत के लिए संतुलित खानपान के साथ पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद भी बेहद जरूरी मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि लंबे समय तक नींद पूरी न हो या नींद की गुणवत्ता प्रभावित रहे तो इसका असर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ सकता है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष वर्ल्ड स्लीप डे मनाया जाता है, ताकि लोगों को स्वस्थ नींद के महत्व और उससे जुड़े विकारों के प्रति जागरूक किया जा सके।

स्लीप डिसऑर्डर यानी नींद से जुड़ी ऐसी समस्याएं, जो व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता, अवधि या समय को प्रभावित करती हैं। इनमें अनिद्रा, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, रेस्टलेस लेग सिंड्रोम और नार्कोलेप्सी जैसी स्थितियां शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन विकारों का समय रहते पता लगना और उचित उपचार बेहद जरूरी है।

क्या होता है स्लीप डिसऑर्डर?

स्लीप डिसऑर्डर ऐसी चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को सोने, लगातार सोते रहने या पर्याप्त आरामदायक नींद लेने में परेशानी होती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहने पर मानसिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और दैनिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है।

नींद से जुड़े प्रमुख विकार

क्रोनिक इनसोम्निया में व्यक्ति को लगातार तीन महीने या उससे अधिक समय तक अधिकांश रातों में नींद आने या सोते रहने में कठिनाई होती है, जिससे थकान और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है।

ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया में सोते समय तेज खर्राटे आते हैं और कुछ समय के लिए सांस रुकने जैसी स्थिति बन सकती है, जिससे बार-बार नींद टूटती है।

रेस्टलेस लेग सिंड्रोम में आराम की स्थिति में भी पैरों को लगातार हिलाने की इच्छा होती है।

नार्कोलेप्सी ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति के लिए जागने और सोने के समय को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।

शिफ्ट वर्क स्लीप डिसऑर्डर आमतौर पर अनियमित या नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों में देखा जाता है, जिसमें सोने और जागने का सामान्य चक्र प्रभावित हो जाता है।

डिलेड स्लीप फेज सिंड्रोम में व्यक्ति सामान्य समय से काफी देर बाद सो पाता है और सुबह समय पर उठने में परेशानी होती है।

स्लीप डिसऑर्डर के सामान्य लक्षण

सोने में 30 मिनट से अधिक समय लगना, रात में बार-बार नींद खुलना, खर्राटे लेना, सोते समय सांस रुकना या घुटन महसूस होना, आराम करते समय पैरों को लगातार हिलाने की इच्छा होना और जागने पर शरीर हिलाने में असमर्थता महसूस होना इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं।

किन कारणों से बढ़ सकता है खतरा?

विशेषज्ञों के मुताबिक हार्ट डिजीज, अस्थमा, लगातार दर्द, तंत्रिका संबंधी समस्याएं, डिप्रेशन, एंग्जायटी, आनुवंशिक कारण, कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव, नाइट शिफ्ट में काम करना, सोने से पहले कैफीन या अल्कोहल का सेवन तथा मस्तिष्क में कुछ रसायनों या मिनरल्स का कम स्तर स्लीप डिसऑर्डर का कारण बन सकते हैं।

डॉक्टरों ने क्या कहा?

सीएमआरआई कोलकाता के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख और निदेशक डॉ. राजा धर के अनुसार, दुनिया की 10 प्रतिशत से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार के स्लीप डिसऑर्डर से प्रभावित है। उनके मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ लोग नींद से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जबकि लगभग 5 करोड़ लोग स्लीप एपनिया और अनिद्रा जैसी स्थितियों से प्रभावित हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में मरीजों की समय पर पहचान नहीं हो पाती।

उन्होंने बताया कि जागरूकता की कमी के कारण हार्ट संबंधी बीमारियां, मेटाबॉलिक विकार और मानसिक कार्यक्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है। यदि किसी व्यक्ति को तेज खर्राटे आते हैं, दिनभर अत्यधिक थकान महसूस होती है या रात में घुटन के साथ नींद खुलती है, तो बिना देर किए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

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