तिब्बत में चीन का महाडैम बना बड़ा खतरा? भूकंप आया तो भारत-बांग्लादेश में मच सकती है तबाही, करोड़ों लोगों पर संकट

नई दिल्ली: नेपाल में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के गंभीर खतरे को एक बार फिर सामने ला दिया है। इसी बीच तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के निर्माणाधीन विशाल जलविद्युत प्रोजेक्ट को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस परियोजना में एक बेहद बड़ा बांध बनाया जा रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यारलुंग त्सांगपो के नाम से भी जाना जाता है। हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह परियोजना ऐसे भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है, जहां बड़े भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है और अतीत में भी यहां विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं।
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के रणनीतिक अध्ययन विभाग के प्रोफेसर एमेरिटस ब्रह्मा चेल्लानी ने ‘प्रोजेक्ट सिंडिकेट’ के लिए लिखे एक लेख में इस परियोजना को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अब सबसे बड़ी चिंता विदेशी आलोचकों की चेतावनी नहीं, बल्कि चीन के अपने वैज्ञानिकों की ओर से सामने आई चेतावनी है।
चेल्लानी ने चीनी भाषा की पत्रिका ‘सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ में हाल में प्रकाशित एक शोधपत्र का हवाला दिया है। इस शोधपत्र में उस क्षेत्र की भूगर्भीय परिस्थितियों को लेकर गंभीर खतरों का उल्लेख किया गया है, जहां विशाल बांध का निर्माण किया जा रहा है।
भूकंप आया तो कैसे बन सकता है ‘वॉटर बम’?
शोधपत्र के मुताबिक, परियोजना वाले इलाके में जमीन की संरचना कमजोर और ढीली है। यहां चट्टानों और मिट्टी के बीच पकड़ भी कमजोर बताई गई है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि यदि जमीन के भीतर मौजूद भ्रंश में हलचल होती है या तेज भूकंप आता है, तो बड़े इलाके की जमीन अस्थिर हो सकती है। ऐसी स्थिति में बांध के जलाशय के साथ-साथ आसपास तैयार किए जा रहे बुनियादी ढांचे पर भी खतरा पैदा हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने जोखिम कम करने के लिए जलाशय के आसपास मौजूद ढलानों को मजबूत करने, उन्हें सहारा देने वाली संरचनाएं तैयार करने और परियोजना के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों के डिजाइन में दोबारा बदलाव करने की सलाह दी है। इन उपायों का मकसद किसी बड़े हादसे की आशंका को कम करना है।
चेल्लानी का कहना है कि जब चीन की राजनीतिक व्यवस्था के तहत काम करने वाले उसके अपने वैज्ञानिक इस तरह के भूगर्भीय खतरे को लेकर चेतावनी दे रहे हैं, तो पूरी दुनिया को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
भारत के लिए क्यों बेहद अहम है ब्रह्मपुत्र?
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए ब्रह्मपुत्र बेहद महत्वपूर्ण नदी है। इस नदी का सीधा संबंध खेती, मछली पालन और आर्द्रभूमियों से है। लाखों लोगों की जिंदगी और आजीविका इस नदी पर निर्भर है। भारत से आगे बढ़ने के बाद यही नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां यह मीठे पानी के प्रमुख स्रोतों में शामिल है।
‘प्रोजेक्ट सिंडिकेट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की मेकांग नदी पर बनी बड़ी परियोजनाओं की तरह ब्रह्मपुत्र पर बनाया जा रहा यह विशाल बांध भी सीमा पार नदी के पानी के प्राकृतिक बहाव को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ नीचे की ओर पहुंचने वाली उपजाऊ मिट्टी और पोषक तत्वों से भरपूर गाद की मात्रा भी कम हो सकती है। यह गाद नदी के पर्यावरण और नदी किनारे होने वाली खेती के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि परियोजना से जुड़े सामान्य रखरखाव और मरम्मत के काम का भी नदी के नीचे की दिशा में मौजूद पारिस्थितिकी तंत्र, खेती, तलछट के प्रवाह और बाढ़ के स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
बांध टूटा तो भारत और बांग्लादेश में आ सकती है भयंकर बाढ़
चेल्लानी ने इससे भी गंभीर स्थिति की आशंका उस वक्त जताई है, जब भूकंप के कारण बांध की संरचना को नुकसान पहुंच जाए या बांध पर दबाव बढ़ने के बाद अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ना पड़े। ऐसी स्थिति में भारत और बांग्लादेश की ओर स्थित घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों में बिना पर्याप्त चेतावनी के भीषण बाढ़ आ सकती है।
उनके मुताबिक, तिब्बत में शुरू की गई इस तरह की बड़ी इंजीनियरिंग परियोजना में होने वाली दुर्घटना का असर केवल बांध या उसके आसपास के क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह आगे चलकर बड़े मानवीय संकट में बदल सकती है और इसका प्रभाव बांग्लादेश तक पहुंच सकता है। बांग्लादेश दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल है।
क्या तिब्बत के पानी को रणनीतिक ताकत बना रहा चीन?
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पूरे मामले का एक पहलू पर्यावरणीय खतरा है, जबकि दूसरा रणनीतिक है। इसमें दावा किया गया है कि चीन तिब्बती पठार पर अपने नियंत्रण को धीरे-धीरे रणनीतिक ताकत के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। तिब्बती पठार एशिया की कई बड़ी नदियों का स्रोत है।
चीन ने सीमा पार बहने वाली नदियों पर कई बड़ी परियोजनाएं बनाई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, तनाव की परिस्थितियों में चीन ने नदियों के पानी और उनके बहाव से जुड़े आंकड़े साझा करने से इनकार किया है। इसके अलावा नीचे की ओर स्थित देशों के साथ पानी के बंटवारे को लेकर किसी संधि में शामिल होने से भी चीन ने इनकार किया है।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस तरह नदी का पानी चीन की दबाव बनाने वाली रणनीति का एक माध्यम बन सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि हाल की जानकारी से संकेत मिलता है कि चीन के वैज्ञानिक शायद इस परियोजना से जुड़े खतरों को वहां के राजनीतिक नेतृत्व की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं।
चेल्लानी के मुताबिक, चीन के अपने भूवैज्ञानिक वैज्ञानिक जब संभावित खतरों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं, तब बीजिंग को परियोजना में पारदर्शिता को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका कहना है कि ब्रह्मपुत्र का पानी केवल चीन का मामला नहीं है और तिब्बत में बन रही इस विशाल परियोजना के प्रभाव को सीमा के बाहर स्थित देशों की जिम्मेदारी के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।



