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अल-नीनो की आहट से बढ़ी चिंता! अभी दिखा है ट्रेलर, अगले 5 महीने बारिश, खेती और महंगाई पर पड़ सकता है बड़ा असर

नई दिल्ली: देश में मॉनसून की सुस्त शुरुआत के बीच मौसम वैज्ञानिकों ने अल-नीनो को लेकर नई चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल इसका सीमित प्रभाव दिखाई दे रहा है, लेकिन जुलाई से नवंबर के बीच इसके असर में तेजी आ सकती है। ऐसे में बारिश, खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जून की शुरुआत में केरल पहुंचा, लेकिन शुरुआती चरण में कई राज्यों में अपेक्षा से कम बारिश दर्ज की गई। मौसम विभाग का अनुमान है कि इस वर्ष पूरे मॉनसून सीजन में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जिससे कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनने का खतरा पैदा हो गया है।

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?

अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और भारत तक पहुंचने वाली नमी वाली हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यही वजह है कि अल-नीनो के वर्षों में भारत में मॉनसून अक्सर कमजोर रहता है। चूंकि देश की करीब 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा मॉनसून से होती है, इसलिए इसका सीधा असर कृषि, जल भंडारण, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

जुलाई से सितंबर के बीच दिख सकता है बड़ा असर

वैज्ञानिकों का मानना है कि जून में अल-नीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर रहेगा, लेकिन जुलाई और अगस्त में इसकी तीव्रता बढ़ सकती है। सितंबर तक इसके और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक मॉनसून का सबसे महत्वपूर्ण दौर जुलाई से सितंबर के बीच होता है। यदि इसी समय अल-नीनो मजबूत हुआ तो वर्षा में और कमी आ सकती है, जिससे जलाशयों में पानी का स्तर घटने, नदियों में प्रवाह कम होने और भूजल संकट गहराने की आशंका है।

कमजोर शुरुआत ने बढ़ाई किसानों की चिंता

जून के पहले दो सप्ताह में कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश रिकॉर्ड की गई। महाराष्ट्र समेत कई इलाकों में वर्षा की बड़ी कमी दर्ज हुई है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने लगी है।

धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें समय पर और पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती हैं। ऐसे में मॉनसून की कमजोर शुरुआत किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है।

खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पूरे सीजन में बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इसका असर किसानों की आय, कृषि आधारित रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्षा आधारित खेती का दायरा बड़ा है। ऐसे क्षेत्रों में छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।

पशुपालन क्षेत्र पर भी असर पड़ने की आशंका है, क्योंकि कम बारिश के कारण चारे की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

जल संकट और गर्मी दोनों बढ़ा सकते हैं मुश्किलें

कम बारिश का सीधा असर पेयजल और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। कई शहर और ग्रामीण क्षेत्र पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। यदि मॉनसून कमजोर रहा तो पानी की उपलब्धता और प्रभावित हो सकती है।

इसके साथ ही अल-नीनो के कारण तापमान बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। लंबे समय तक चलने वाली गर्म हवाएं और तीव्र गर्मी बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले लोगों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती हैं।

महंगाई और विकास दर पर भी पड़ सकता है प्रभाव

कृषि उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में खाद्यान्न, दालों और सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा तो आर्थिक विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है।

सरकार ने संभावित परिस्थितियों को देखते हुए विभिन्न स्तरों पर तैयारी शुरू कर दी है। सूखा राहत योजनाओं, फसल बीमा और वैकल्पिक कृषि रणनीतियों पर भी जोर दिया जा रहा है।

इतिहास से मिले हैं कई संकेत

पिछले दशकों के आंकड़े बताते हैं कि कई अल-नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम वर्षा मिली है। हालांकि कुछ वर्षों में अन्य मौसमीय कारकों ने इसके प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित भी किया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार भी हिंद महासागर से जुड़ी मौसमीय परिस्थितियां आगे चलकर कुछ राहत दे सकती हैं, लेकिन फिलहाल मॉनसून और अल-नीनो की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में जल संरक्षण, सूखा सहनशील फसलों का उपयोग और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना भविष्य की जरूरत बनता जा रहा है।

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